जून 2026 तक भारतीय कंपनियों के प्रमोटरों ने अपने शेयरों को गिरवी रखकर **₹7 लाख करोड़** से ज्यादा का कर्ज लिया है, जो कि 2019 के मुकाबले 3 गुना ज्यादा है। यह बढ़ता ट्रेंड मार्केट में अस्थिरता और गिरावट के समय 'फोर्स सेलिंग' का खतरा पैदा कर सकता है।
जून 2026 की तिमाही तक प्रमोटरों द्वारा इक्विटी के बदले लिया गया कर्ज ₹7 लाख करोड़ के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा जून 2019 में ₹2 लाख करोड़ था। यह कर्ज या तो सीधे शेयरों को गिरवी (Pledge) रखकर लिया गया है या फिर 'Non-Disposal Undertakings' (NDU) के जरिए लिया गया है, जहां प्रमोटर कर्ज की अवधि के दौरान शेयर न बेचने का वादा करते हैं।
यह ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है?
प्रमोटर अक्सर इक्विटी डाइल्यूशन (नए शेयर जारी करना) से बचने के लिए शेयर गिरवी रखने का रास्ता चुनते हैं। यह फंड आमतौर पर इंफ्रास्ट्रक्चर, माइनिंग या मैन्युफैक्चरिंग जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि, कुल प्रमोटर हिस्सेदारी का जो हिस्सा गिरवी है, वह 7 साल पहले के 2.52% से बढ़कर अब 3.17% हो गया है, जो इस फंडिंग मॉडल पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।
निवेशकों के लिए 'मार्जिन कॉल' का डर
जब किसी कंपनी के शेयर की कीमत तेजी से गिरती है, तो गिरवी रखे गए शेयरों की वैल्यू भी कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में लेंडर प्रमोटर से और कैश या शेयर की मांग करता है, जिसे 'मार्जिन कॉल' कहते हैं। यदि प्रमोटर ऐसा नहीं कर पाते, तो लेंडर खुले बाजार में शेयर बेचने के लिए मजबूर हो सकते हैं, जिससे स्टॉक की कीमत में भारी गिरावट आ सकती है।
निवेश से पहले क्या देखें?
हर गिरवी शेयर बुरा नहीं होता, लेकिन आपको यह जरूर देखना चाहिए कि कंपनी कर्ज का इस्तेमाल बिजनेस बढ़ाने के लिए कर रही है या लिक्विडिटी की समस्या सुलझाने के लिए। NSE और BSE की वेबसाइट पर जाकर प्रमोटर होल्डिंग और 'encumbered' (गिरवी) शेयरों की जानकारी जरूर देखें। जिन कंपनियों में 90% से ज्यादा प्रमोटर हिस्सेदारी गिरवी है, वहां निवेश करने से पहले कंपनी का कैश फ्लो और कर्ज चुकाने की क्षमता का आकलन करना बेहद जरूरी है।
