दिग्गज निवेशक Prashant Jain ने US 10-Year Treasury Yields में हो रही बढ़ोतरी को लेकर सतर्क किया है। उनका कहना है कि अगर यह यील्ड **6%** के स्तर को पार करती है, तो ग्लोबल मार्केट और भारतीय शेयरों के वैल्यूएशन में भारी गिरावट आ सकती है और विदेशी निवेश बाहर जा सकता है। हालांकि, भारत के मजबूत फॉरेक्स रिजर्व इसे कुछ हद तक संभालने में सक्षम हैं।
वैल्यूएशन पर दबाव का रिस्क
3P Investment Managers के फाउंडर और CIO, Prashant Jain का मानना है कि ग्लोबल इक्विटी मार्केट के लिए US 10-Year Treasury Yield का बढ़ना एक बड़ी चुनौती है। फिलहाल यह 5.2% के करीब है, लेकिन 6% का स्तर एक 'क्रिटिकल थ्रेशोल्ड' है। यदि यील्ड इस स्तर तक पहुँचती है, तो कंपनियों के वैल्यूएशन के गणित में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
कैपिटल आउटफ्लो का डर
US बॉन्ड यील्ड ग्लोबल लेवल पर 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल' का बेंचमार्क होती है। जब यील्ड बढ़ती है, तो सुरक्षित सरकारी बॉन्ड्स में निवेश करना, भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स के जोखिम भरे शेयरों से ज्यादा आकर्षक हो जाता है। इससे 'वैल्यूएशन कंप्रेशन' होता है, जहाँ शेयर की कीमतें घटने लगती हैं क्योंकि भविष्य की कमाई का वर्तमान मूल्य (Present Value) कम हो जाता है। साथ ही, FII का पैसा डॉलर-डिनॉमिनेटेड एसेट्स की तरफ खिंचने से घरेलू लिक्विडिटी पर दबाव बढ़ता है।
भारत की स्थिति कितनी मजबूत?
बीते दशकों की तुलना में आज भारत बेहतर स्थिति में है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) लगभग $700 बिलियन के स्तर पर है, जो ग्लोबल बाजार की उठापटक में एक सुरक्षा कवच का काम करता है। यही कारण है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को सहने के लिए अधिक लचीली है। हालांकि, निवेशकों को अब ग्रोथ शेयरों से हटकर उन लार्ज-कैप स्टॉक्स पर ध्यान देना चाहिए जिनकी अर्निंग्स में स्थिरता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
आने वाले समय में उन कंपनियों के मैनेजमेंट पर नजर रखना जरूरी होगा, जिन पर कर्ज (Debt) का बोझ ज्यादा है। बढ़ती ब्याज दरों के कारण कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों को US Federal Reserve की पॉलिसी और बॉन्ड मार्केट की हर हलचल पर पैनी नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही मार्केट की आगे की दिशा तय करेंगे।
