कॉमर्स मिनिस्टर Piyush Goyal ने Rotterdam Port का दौरा किया है, ताकि भारतीय सामानों के लिए इसे एक मुख्य ट्रांजिट हब बनाया जा सके। अक्टूबर **2025** में लागू हुए India-EFTA ट्रेड एग्रीमेंट के बाद, इस कदम का मकसद शिपिंग कॉस्ट को घटाना और यूरोपियन मार्केट्स तक माल पहुँचाने की रफ्तार बढ़ाना है।
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री Piyush Goyal ने हाल ही में नीदरलैंड्स के Rotterdam Port का दौरा किया है। यूरोप के सबसे बड़े और व्यस्त बंदरगाहों में से एक होने के नाते, यह भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए यूरोप का मुख्य गेटवे साबित हो सकता है। सरकार का उद्देश्य शिपिंग के लिए अधिक कुशल रास्तों की पहचान करना है, जिससे भारत से यूरोप तक सामान भेजने में लगने वाला समय और खर्च दोनों कम हो सकें।
नई ट्रेड डील का असर
यह दौरा 1 अक्टूबर 2025 को भारत और European Free Trade Association (EFTA) के बीच हुए ट्रेड एंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) के बाद काफी महत्वपूर्ण हो गया है। इस डील में स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन शामिल हैं। हालांकि टैरिफ कम होने से रास्ते आसान हुए हैं, लेकिन भारतीय कंपनियों के लिए लॉजिस्टिक्स कॉस्ट अब भी एक बड़ी चुनौती है।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी?
इन्वेस्टर के नजरिए से देखें तो लॉजिस्टिक्स कॉस्ट का सीधा असर कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर पड़ता है। अगर यह पहल सफल होती है, तो इंजीनियरिंग गुड्स, टेक्सटाइल्स और फार्मा सेक्टर की कंपनियों के लिए कॉम्पिटिटिव लाभ बढ़ सकता है। हालांकि, निवेशकों को यह भी ध्यान रखना होगा कि शिपिंग के अलावा, यूरोपियन यूनियन के सख्त नियम जैसे Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM) का पालन करना भी एक्सपोर्टर्स के लिए अनिवार्य है।
सरकार अब केवल लॉजिस्टिक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी जोर दे रही है, जिससे भारतीय कंपनियां अपनी मैन्युफैक्चरिंग कैपेबिलिटीज को अपग्रेड कर सकें। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकारी स्तर पर की जा रही इन कोशिशों का असर शिपिंग टाइम और फ्रेट कॉस्ट में कितनी जल्दी दिखाई देता है।
