वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ (EU) के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) पर चिंता जताई है। इस नए नियम के तहत भारतीय स्टील और एल्युमीनियम जैसे एक्सपोर्ट्स पर **20% से 35%** तक का भारी टैरिफ लग सकता है, जिससे कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ना तय है।
मुनाफे पर बढ़ेगा दबाव
यूरोपीय बाजार भारतीय मेटल कंपनियों के लिए एक बड़ा एक्सपोर्ट हब है। उद्योग के जानकारों का मानना है कि यदि EU के कार्बन टैक्स नियम लागू होते हैं, तो स्टील और एल्युमीनियम की लागत 20% से 35% तक बढ़ सकती है। इसका सीधा असर कंपनियों के नेट प्रॉफिट पर पड़ेगा, क्योंकि या तो उन्हें खुद यह लागत वहन करनी होगी या फिर दाम बढ़ाकर मार्केट शेयर खोने का जोखिम उठाना होगा।
नॉन-टैरिफ बैरियर की चुनौती
सिर्फ मेटल्स ही नहीं, मंत्री पीयूष गोयल ने 'यूरोपीय संघ वनीकरण विनियमन' (EUDR) पर भी सवाल उठाए हैं। ये नियम सस्टेनेबिलिटी के नाम पर 'नॉन-टैरिफ बैरियर' की तरह काम कर रहे हैं, जिससे एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों का अनुपालन खर्च (Compliance Cost) बढ़ गया है। इसके अलावा, स्टील और सीमेंट जैसे कच्चे माल की बढ़ती लागत से इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के बजट पर भी बुरा असर पड़ने की आशंका है।
रेगुलेटरी ओवरलोड का असर
मंत्री ने जर्मनी के ऑटोमोबाइल सेक्टर का उदाहरण देते हुए बताया कि अत्यधिक नियमों के कारण कैसे औद्योगिक विकास धीमा पड़ जाता है। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में जर्मनी में वाहनों की बिक्री में 15-20% की गिरावट आई है, जिसका एक बड़ा कारण करीब 77 जटिल नियम हैं जो परिचालन लागत को बढ़ाते हैं। भारत का रुख साफ है—विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर थोपे गए ऐसे प्रतिबंध वैश्विक व्यापार में नई बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।
