कॉमर्स मिनिस्टर Piyush Goyal ने नीदरलैंड्स में EU के 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) पर कड़ा ऐतराज जताया है। EU ने इस टैक्स को 'नॉन-नेगोशिएबल' करार दिया है, जिससे भारत के स्टील और एल्युमीनियम जैसे सेक्टर के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।
विवाद की जड़ क्या है?
भारत और नीदरलैंड्स के बिजनेस फोरम के दौरान कॉमर्स मिनिस्टर Piyush Goyal ने EU के इस नए नियम पर अपना विरोध दर्ज कराया। उनका तर्क है कि इतने कड़े रेगुलेटरी अनुपालन (Compliance) बिजनेस के लिए बाधा हैं और इससे ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। वहीं, डच ट्रेड मिनिस्टर Sjoerd Sjoerdsma ने साफ कर दिया कि पेरिस एग्रीमेंट के तहत यह टैक्स उनके क्लाइमेट लक्ष्यों के लिए अनिवार्य है।
भारतीय कंपनियों पर असर
CBAM असल में उन एनर्जी-इंटेंसिव इंपोर्ट्स पर लगने वाला कार्बन टैक्स है, जिनमें मुख्य रूप से स्टील, एल्युमीनियम और फर्टिलाइजर शामिल हैं। जो भारतीय कंपनियां यूरोप में बड़े स्तर पर एक्सपोर्ट करती हैं, उनके लिए यह एक नई वित्तीय जटिलता है।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
यह पॉलिसी सीधे तौर पर उन कंपनियों के प्रॉफिट मार्जिन पर चोट कर सकती है जो यूरोप को अपना माल बेचती हैं। निवेशकों को अब इन कंपनियों की तरफ देखना चाहिए:
- Decarbonization: जिन कंपनियों ने एनर्जी-एफिशिएंट टेक्नोलॉजी में निवेश किया है, वे इस बदलाव को आसानी से झेल पाएंगी।
- Pricing Power: क्या कंपनियां अपनी लागत बढ़ाकर यह टैक्स ग्राहकों पर डाल पाएंगी? अगर नहीं, तो उनके earnings पर दबाव बढ़ना तय है।
हालांकि, नीदरलैंड्स ने छोटे और मध्यम स्तर के उद्यमों (SMEs) के लिए प्रक्रिया सरल करने का संकेत दिया है, लेकिन कार्बन टैक्स की मूल संरचना बनी रहेगी। आने वाले समय में एक्सपोर्ट-हेवी कंपनियों की मैनेजमेंट कमेंट्री पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
