प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने चेतावनी दी है कि भारत को 'मिडिल-इनकम ट्रैप' (Middle-Income Trap) से बचने के लिए शिक्षा, हेल्थकेयर और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाना होगा। लंबी अवधि में टिकाऊ ग्रोथ के लिए अब कैपिटल के बजाय प्रोडक्टिविटी पर ध्यान देना जरूरी है।
फ्रांसीसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी का मानना है कि भारत के लिए हाई-इनकम इकॉनमी बनने का रास्ता अब बदल गया है। उनका कहना है कि 'मिडिल-इनकम ट्रैप'—वह स्थिति जहां विकास दर धीमी हो जाती है और मजदूरी बढ़ने के साथ प्रतिस्पर्धा कम होने लगती है—से बचने का एकमात्र तरीका मानव संसाधन और बुनियादी ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश करना है।
प्रोडक्टिविटी की ओर शिफ्ट
निवेशकों के लिए पिकेटी की यह राय एक संकेत है कि अब सिर्फ सड़कों या कारखानों से विकास की रफ्तार बनाए रखना मुश्किल होगा। जैसे-जैसे इकॉनमी मैच्योर होती है, असली वैल्यू प्रोडक्टिविटी, टेक्नोलॉजी और स्किल्ड वर्कफोर्स से आती है।
यूनेस्को के 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के लिए तस्वीर थोड़ी जटिल है। शिक्षा पर जीडीपी का खर्च 4.1% पर स्थिर रहा है, लेकिन कुल सरकारी खर्च में इसका हिस्सा 1.5% घटकर 14.2% रह गया है। यह डेटा साफ दिखाता है कि ह्यूमन कैपिटल पर जोर कम हो रहा है, जो भविष्य की ग्रोथ के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
किन सेक्टरों पर नजर रखें?
पिकेटी का यह विजन लॉन्ग-टर्म निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण है। प्राइवेट हॉस्पिटल चेन, ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, कंस्ट्रक्शन कंपनियां और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर इस विकास गाथा के आधार हैं। हालांकि, इसमें एक जोखिम भी है—सरकारी खर्च बढ़ने से कर्ज (Debt) का दबाव बढ़ सकता है। निवेशकों को यह देखना होगा कि सरकार बिना फिस्कल घाटा बढ़ाए इन जरूरी सेक्टरों पर कैसे खर्च करती है।
क्लाइमेट चेंज: एक बड़ा खतरा
पिकेटी ने यह भी चेतावनी दी है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के शोर के बीच क्लाइमेट चेंज भारत के लिए बड़ा खतरा है। लो-कार्बन इकॉनमी में शिफ्ट होने से पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, निवेशकों को अब यह ट्रैक करना चाहिए कि सरकार और कंपनियां इस स्किल्ड और क्लाइमेट-रेजिलिएंट बदलाव में कितनी सक्रियता दिखा रही हैं।
