US डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस ने 'FORTRESS' पहल शुरू की है, जिसका लक्ष्य मिलिट्री बेस को सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर से अलग कर **90 दिन** तक पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाना है। इस प्लान में पोर्टेबल न्यूक्लियर रिएक्टर्स और इंडिपेंडेंट पावर ग्रिड्स का इस्तेमाल किया जाएगा, जो ग्लोबल डिफेंस सप्लाई चेन में एक नए ट्रेंड का संकेत है।
अमेरिकी रक्षा विभाग (Pentagon) ने 'FORTRESS' प्रोग्राम के जरिए एक बड़ा रणनीतिक बदलाव पेश किया है। इसका उद्देश्य मिलिट्री बेस को अगले 90 दिनों तक बिजली, पानी और कम्युनिकेशन नेटवर्क के लिए आम जनता के इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर न रहने देना है। यह कदम युद्ध जैसी स्थितियों में सार्वजनिक सुविधाओं की नाजुकता को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।
टेक्नोलॉजी-ड्रिवन रेजिलिएंस
FORTRESS रणनीति पूरी तरह से हाई-टेक सॉल्यूशंस पर आधारित है। इसमें पोर्टेबल न्यूक्लियर रिएक्टर्स यानी Small Modular Reactors (SMRs), लार्ज-स्केल बैटरी स्टोरेज और डीसेंट्रलाइज्ड पावर ग्रिड्स का उपयोग किया जाएगा। इसके अलावा, मेडिकल सप्लाई और क्रिटिकल मिनरल्स के रणनीतिक भंडार तैयार किए जा रहे हैं। साथ ही, ऐसे प्रोटोकॉल बनाए जा रहे हैं ताकि जरूरत पड़ने पर सिविल मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज को डिफेंस प्रोडक्शन में बदला जा सके।
भारतीय डिफेंस सेक्टर पर असर
निवेशकों के लिए यह बदलाव 'Atmanirbhar Bharat' की तर्ज पर ग्लोबल डिफेंस और एनर्जी ट्रेंड्स को समझने का मौका है। भारत भी एनर्जी सिक्योरिटी के लिए SMRs और इंडिजिनस (स्वदेशी) डिफेंस प्रोडक्शन पर तेजी से काम कर रहा है। जैसे-जैसे दुनिया मिलिट्री ऑपरेशंस को सिविल सिस्टम से 'डिकपल' (अलग) कर रही है, भविष्य में रग्डाइज्ड पावर सॉल्यूशंस, डीसेंट्रलाइज्ड ग्रिड टेक्नोलॉजी और डिफेंस-मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी कंपनियों की मांग बढ़ने की उम्मीद है।
जोखिम और मॉनिटर करने लायक बातें
यह प्रोजेक्ट बहुत अधिक पूंजी यानी 'कैपिटल-इंटेंसिव' है। इन टेक्नोलॉजीज को मौजूदा सिस्टम में फिट करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है, जिससे प्रोजेक्ट में देरी या लागत बढ़ने का रिस्क भी है। निवेशकों को यह देखना होगा कि अमेरिकी सरकार बजट का कितना हिस्सा इन टेक्नोलॉजीज के लिए आवंटित करती है, क्योंकि यह सरकारी प्रोक्योरमेंट कॉन्ट्रैक्ट्स पाने वाली पावर, बैटरी और डिफेंस कंपनियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
