संसदीय समिति की एक रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सरकारी स्कूलों में **73%** छात्र हायर सेकेंडरी (Higher Secondary) पूरा करने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह रिपोर्ट नामांकन में भारी गिरावट और स्कूलों में सुविधाओं की कमी को उजागर करती है।
सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल
संसदीय समिति ने देश की सार्वजनिक शिक्षा की स्थिति पर चिंता जताई है। समिति की 10वीं रिपोर्ट (2026-27) में खुलासा हुआ है कि 73% छात्र सीनियर सेकेंडरी (Senior Secondary) तक की पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते और बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं। यह स्थिति देश भर में सीनियर सेकेंडरी स्कूलों की पहुंच और उपलब्धता में बड़ी खामियों की ओर इशारा करती है।
नामांकन में भारी गिरावट
UDISE 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, जैसे-जैसे छात्र शिक्षा के विभिन्न स्तरों से गुजरते हैं, नामांकन की संख्या तेजी से गिरती जाती है। प्राइमरी स्तर पर सरकारी स्कूलों में 6.1 करोड़ से ज़्यादा बच्चे पढ़ते हैं, लेकिन अपर प्राइमरी तक यह संख्या घटकर करीब 4 करोड़ रह जाती है। सेकेंडरी स्कूल तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा सिर्फ 2.3 करोड़ रह जाता है। वहीं, हायर सेकेंडरी स्तर पर केवल 1.6 करोड़ छात्र ही बचते हैं। रिपोर्ट में स्कूलों की उपलब्धता में भी एक बड़ी समस्या बताई गई है - जहां देश भर में 9.11 लाख से ज़्यादा प्राइमरी स्कूल हैं, वहीं हायर सेकेंडरी संस्थानों की संख्या सिर्फ 90,866 है।
विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों के लिए सुविधाओं का अभाव
नामांकन के आंकड़ों के अलावा, समिति ने खासकर विशेष ज़रूरतों वाले बच्चों (Children with Special Needs - CwSN) के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) की कमी पर भी प्रकाश डाला है। किए गए ऑडिट में पाया गया कि देश के आधे से ज़्यादा स्कूलों में अभी भी विकलांग बच्चों के लिए ज़रूरी सुलभ सुविधाएं मौजूद नहीं हैं। कुल 14.7 लाख स्कूलों में से बड़ी संख्या में स्कूलों में रैंप (Ramp) और हैंडरेल (Handrail) की कमी है, या फिर विशेष ज़रूरतों वाले छात्रों के लिए अलग से शौचालय (Toilet) नहीं हैं। समिति का कहना है कि ये कमियां सभी के लिए शिक्षा के लक्ष्यों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National Education Policy) के समावेशी (Inclusive) उद्देश्यों के विपरीत हैं।
फंड के इस्तेमाल में अनदेखी
समिति ने शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education) द्वारा फंड के उपयोग में भी अक्षमता पर सवाल उठाए हैं। 2024-25 के लिए, CwSN-फ्रेंडली शौचालयों के लिए आवंटित 482 लाख रुपये के बजट में से केवल 2.60 लाख रुपये ही खर्च हुए। इसी तरह, विशेष शिक्षकों (Special Educators) की भर्ती के लिए आवंटित 962 लाख रुपये में से केवल 80.50 लाख रुपये का ही उपयोग हुआ। यह फंड का कम उपयोग बेहतर नीति कार्यान्वयन (Policy Execution) और वित्तीय लक्ष्यों की सख्त निगरानी की ज़रूरत को दर्शाता है।
अर्थव्यवस्था पर असर
ये नतीजे कुशल कार्यबल (Skilled Workforce) तैयार करने में आने वाली चुनौतियों को रेखांकित करते हैं, क्योंकि बुनियादी शिक्षा ही मानव पूंजी (Human Capital) का आधार है। समिति ने शिक्षा मंत्रालय को बजट निष्पादन (Budget Execution) में सुधार करने और मौजूदा प्राइमरी और सेकेंडरी स्कूलों को पूर्ण हायर सेकेंडरी संस्थानों में बदलने को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। अब यह देखना होगा कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर सुधार में कितनी तेज़ी लाती है और शिक्षा के लिए फंड के उपयोग की दक्षता बढ़ाकर ड्रॉपआउट दर को कम कर पाती है या नहीं।
