Pradhan Mantri Awas Yojana-Urban (PMAY-U) 2.0 के तहत रेंटल हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में **13,046** यूनिट्स को मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन लोकल लेवल पर देरी के कारण घर मिलने में बाधा आ रही है। हालांकि सरकार ने इसके लिए **₹3,000 करोड़** का फंड रखा है, फिर भी मंजूरी और निर्माण के बीच का फासला एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
जमीन पर काम की रफ्तार क्यों धीमी है?
अगस्त 2026 तक, सरकार ने प्रवासी श्रमिकों के लिए 13,046 रेंटल यूनिट्स को मंजूरी दी है। यह मिशन का एक अहम कदम है, लेकिन असल चुनौती निर्माण और हैंडओवर की सुस्त रफ्तार है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में सरकार ने PMAY-U 2.0 के लिए ₹3,000 करोड़ और कुल PMAY-Urban के लिए ₹18,625 करोड़ का बड़ा बजट आवंटित किया है। इसके बावजूद, यह स्कीम 'डिमांड-ड्रिवन' होने के कारण स्थानीय निकायों और नगर निगमों की मंजूरी पर निर्भर करती है। इसी विकेंद्रीकृत (decentralized) प्रक्रिया के कारण प्रोजेक्ट्स की मंजूरी और जमीन पर काम शुरू होने के बीच लंबा और अनिश्चित समय लग रहा है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
रियल एस्टेट सेक्टर के जानकारों के लिए यह समस्या केवल फंड की नहीं, बल्कि लोकल लेवल पर एग्जीक्यूशन (Execution) की है। ये प्रोजेक्ट्स पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) पर आधारित हैं, लेकिन स्टील और सीमेंट की बढ़ती कीमतों के कारण प्राइवेट डेवलपर्स के मार्जिन पर दबाव है। जब तक मजबूत इंसेंटिव या लैंड-यूज अप्रूवल में तेजी नहीं आती, डेवलपर्स इस सेगमेंट में बड़े निवेश से बच रहे हैं।
सबसे बड़ा रिस्क: लोकेशन
एक बड़ी चिंता भौगोलिक विसंगति (geographic mismatch) की भी है। रेंटल यूनिट्स मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों के लिए हैं, लेकिन अगर ये प्रोजेक्ट्स शहर की परिधि पर बिना कनेक्टिविटी के बनाए जाते हैं, तो ऑक्यूपेंसी रेट (occupancy rate) कम रहने का खतरा है।
आने वाले समय में निवेशकों को केवल 'मंजूर हुई यूनिट्स' की संख्या नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट के पूरा होने (commissioning) की दर पर नजर रखनी चाहिए। म्युनिसिपल लेवल पर अप्रूवल और नई फिस्कल पॉलिसी ही तय करेगी कि यह स्कीम शहरी आवास की कमी को पूरा कर पाएगी या नहीं।
