भारत की PM Internship Scheme ने अपनी सफलता का लोहा मनवाया है। तीसरे पायलट राउंड में **40,000** प्लेसमेंट्स के साथ आवेदकों की रुचि में **2.5 गुना** की जबरदस्त बढ़त देखी गई है, जिसके बाद सरकार अब इसे बड़े पैमाने पर लॉन्च करने की तैयारी में है।
बड़े बदलावों का असर
कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) द्वारा किए गए स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स का बड़ा असर दिख रहा है। स्टाइपेंड को बढ़ाकर ₹9,000 करना, आयु सीमा को 18-25 वर्ष के बीच रखना और इंटर्नशिप की अवधि को 6 या 9 महीने का लचीला विकल्प देने जैसे कदमों ने छात्रों का उत्साह बढ़ाया है।
कंपनियों की भूमिका और CSR का तालमेल
यह स्कीम पूरी तरह से कॉर्पोरेट सेक्टर की भागीदारी पर टिकी है। Reliance Industries, Tata Consultancy Services और HDFC Bank जैसी बड़ी कंपनियां इसमें सक्रिय रूप से जुड़ी हैं। ये कंपनियां अपने CSR फंड का उपयोग स्टाइपेंड देने के लिए कर रही हैं, जिससे वे एक तरफ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी कर रही हैं तो दूसरी तरफ उन्हें एक मजबूत 'टैलेंट पाइपलाइन' भी मिल रही है।
भविष्य की राह और चुनौतियां
हालांकि रजिस्ट्रेशन में उछाल एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन नेशनल लेवल पर इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां हो सकती हैं। अक्सर ऐसी ट्रेनिंग स्कीम्स में ऑफर और ज्वाइनिंग के बीच बड़ा अंतर देखा जाता है। लोकेशन की बाध्यताएं, स्टाइपेंड की पर्याप्तता और अन्य कॉम्पिटिटिव एग्जाम्स में छात्रों का रुझान इसके कंप्लीशन रेट को प्रभावित कर सकता है। कंपनियों के लिए भी चुनौती होगी कि वे अपने डेली ऑपरेशनल साइकिल्स के साथ इन इंटर्न्स की ट्रेनिंग को कैसे बैलेंस करती हैं। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या यह स्ट्रक्चर्ड मॉडल एंट्री-लेवल लेबर मार्केट में वाकई स्थिरता ला पाएगा या नहीं।
