US Dollar की मजबूती पर अब बड़े सवाल उठने लगे हैं। Nomura के एक्सपर्ट्स ने अमेरिकी फिस्कल डेफिसिट और टेक सेक्टर में हद से ज्यादा निवेश को करेंसी के लिए बड़ा रिस्क बताया है।
फिसकल डेफिसिट की चिंता
Nomura समेत कई दिग्गज मार्केट एनालिस्ट्स का मानना है कि अमेरिकी डॉलर की साख पर अब दबाव बढ़ रहा है। अमेरिका पर बढ़ते फेडरल कर्ज और लगातार बने हुए फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) के कारण निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय से जारी सरकारी खर्च की रफ्तार अब डॉलर की स्थिरता के लिए चुनौती बनती जा रही है।
टेक सेक्टर और AI का कनेक्शन
मार्केट में डॉलर के प्रति आकर्षण की एक बड़ी वजह टेक और AI सेक्टर में आया विदेशी निवेश है। Nomura की रिपोर्ट के मुताबिक, अभी निवेशकों का बहुत ज्यादा पैसा इन्हीं सेक्टरों में लगा है, जिसे 'Crowded Positioning' कहा जा रहा है। अगर टेक स्टॉक्स का जोश ठंडा पड़ता है या आर्थिक आंकड़ों में सुस्ती आती है, तो यह पैसा तेजी से बाहर निकल सकता है। ऐसी स्थिति में डॉलर में बड़ी गिरावट और करेंसी मार्केट में भारी उतार-चढ़ाव (Volatility) देखने को मिल सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
डॉलर का कमजोर होना सीधे तौर पर उभरते हुए बाजारों, जैसे कि भारत, पर असर डालता है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो FII पैसा बाहर निकालते हैं, लेकिन अगर डॉलर कमजोर होता है, तो ग्लोबल कमोडिटी कीमतों और इंटरेस्ट रेट्स का समीकरण पूरी तरह बदल जाता है। फिलहाल, सभी की नजरें अमेरिकी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) के फैसलों और यूएस ट्रेजरी के डेट मैनेजमेंट पर टिकी हैं। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिकी अर्थव्यवस्था ग्रोथ को बरकरार रख पाती है या फिस्कल दबाव उसे नीचे खींच लेगा।
