साल 2026 में Nifty 50 का प्रदर्शन दुनिया भर के बाजारों के मुकाबले सुस्त रहा है। ग्लोबल मार्केट में AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) की लहर के बीच पूंजी का प्रवाह नॉर्थ एशिया की ओर मुड़ गया है, जिसके चलते भारत से **₹3 लाख करोड़** से ज्यादा का FPI आउटफ्लो देखने को मिला है। साथ ही, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और RBI द्वारा रेपो रेट को **5.50%** करने के फैसले ने सेंटीमेंट पर दबाव बढ़ा दिया है।
विदेशी निवेशकों का मोहभंग और AI का असर
इस साल ग्लोबल मार्केट, खासकर दक्षिण कोरिया और ताइवान, सेमीकंडक्टर और AI हार्डवेयर बूम की वजह से शानदार रिटर्न दे रहे हैं। दूसरी ओर, भारतीय शेयर बाजार में इस गति का अभाव है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FPI) अब अपनी पूंजी को उन मार्केट्स में शिफ्ट कर रहे हैं जो सीधे तौर पर AI साइकिल का फायदा उठा रहे हैं। नतीजतन, भारतीय बाजार में बिकवाली का दबाव बना हुआ है।
कच्चे तेल और जियो-पॉलिटिकल रिस्क का साया
मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) के आसपास के हालात ने ब्रेंट क्रूड ऑयल को $100 प्रति बैरल के ऊपर बनाए रखा है। एक बड़े तेल आयातक देश के रूप में, भारत के लिए यह स्थिति ट्रेड डेफिसिट (Trade Deficit) और रुपये की कमजोरी का कारण बन रही है, जिससे विदेशी निवेशकों का रिटर्न प्रभावित हो रहा है।
RBI का रुख और महंगाई का गणित
महंगाई पर काबू पाने के लिए RBI ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है। 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' (Calibrated Tightening) की इस नीति का लक्ष्य चालू फाइनेंशियल ईयर में महंगाई को 5.2% पर नियंत्रित रखना है। हालांकि, ब्याज दरों में इस बढ़ोतरी से कंपनियों के लिए उधार लेना महंगा हो गया है, जिसका असर प्रॉफिट ग्रोथ पर पड़ना तय है।
आगे की राह
देश का GDP ग्रोथ अनुमान 7.1% रहने की उम्मीद है, जो आर्थिक लचीलेपन को दर्शाता है। निवेशकों को अब इन तीन प्रमुख ट्रिगर्स पर नजर रखनी चाहिए:
- FPI फ्लो: क्या विदेशी निवेशक फिर से भारतीय बाजार में लौटेंगे?
- क्रूड ऑयल: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव।
- कॉर्पोरेट अर्निंग्स: कंपनियों के तिमाही नतीजे बताएंगे कि वे बढ़ती ब्याज दरों और इनपुट कॉस्ट के दबाव को कैसे मैनेज कर रही हैं।
