MSME डेवेलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 को राज्यसभा से मंजूरी मिल गई है। इस नए कानून के तहत, सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) को अब छोटे सप्लायर्स का बकाया भुगतान TReDS प्लेटफॉर्म के ज़रिए करना अनिवार्य होगा। इस कदम से छोटे सप्लायर्स के लिए नकदी (Liquidity) बढ़ेगी और भुगतान प्रक्रिया तेज़ होगी।
TReDS को लेकर नया नियम
MSME डेवेलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 को राज्यसभा से पास कर दिया गया है। यह कानून छोटे और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज (CPSEs) से मिलने वाले भुगतान में बड़ा बदलाव लाएगा। सरकार ने TReDS (ट्रेड रिसीवेबल्स डिस्काउंटिंग सिस्टम) को अनिवार्य कर दिया है, ताकि छोटे व्यवसायों को समय पर भुगतान मिल सके और उनकी ग्रोथ में आने वाली रुकावटें दूर हों।
TReDS का क्या होगा असर?
TReDS एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म है जहाँ MSMEs अपने इनवॉइस अपलोड करके बैंकों और वित्तीय संस्थानों से तुरंत फाइनेंस (Finance) पा सकते हैं। यानी, वे अपने ट्रेड रिसीवेबल्स को तुरंत कैश में बदल सकते हैं। CPSEs के लिए इसे अनिवार्य बनाने से सप्लायर्स का वर्किंग कैपिटल साइकिल (Working Capital Cycle) कम होने की उम्मीद है। अक्सर समय पर पेमेंट न मिलने के कारण MSMEs को महंगे कर्ज़ लेने पड़ते थे, जिससे उनके मुनाफे पर असर पड़ता था। इस बदलाव से सरकारी कंपनियों में पेमेंट के तौर-तरीके एक जैसे हो जाएंगे।
विवादों के निपटारे में तेज़ी
नए कानून में पेमेंट विवादों को सुलझाने के लिए भी एक स्पष्ट प्रक्रिया बनाई गई है। अगर बातचीत से मामला नहीं सुलझता है, तो 30 दिनों के अंदर आर्बिट्रेशन (Arbitration) शुरू करना होगा। इसके बाद आर्बिट्रेटर (Arbitrator) को फाइनल अवार्ड (Award) देने के लिए 90 दिनों की तय समय-सीमा मिलेगी। एक खास बात यह भी है कि अगर कोई डिस्प्यूट (Dispute) छह महीने से ज़्यादा समय तक अनसुलझा रहता है, तो विवादित राशि का कम से कम 50% भुगतान सप्लायर को अंतरिम राहत के तौर पर करना होगा। यह छोटे व्यवसायों को कानूनी कार्यवाही के दौरान आर्थिक मदद देगा।
वित्तीय स्थिति और सेक्टर ग्रोथ
संसद में हुई चर्चा के दौरान MSME मंत्री जीतन राम मांझी ने बताया कि MSME सेक्टर को मिलने वाला क्रेडिट (Credit) काफी बढ़ा है। पिछले फाइनेंशियल ईयर में यह ₹38 लाख करोड़ से ज़्यादा हो गया, जो 2014-15 में सिर्फ ₹10 लाख करोड़ था। मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज (Credit Guarantee Fund Trust for Micro and Small Enterprises) का इस्तेमाल भी तेज़ी से बढ़ा है, जिसने FY2022-23 से FY2025-26 के बीच ₹10.47 लाख करोड़ से ज़्यादा की गारंटी जारी की है। हालांकि, कुछ सांसदों ने चिंता जताई है कि बढ़ती लागत और देरी से मिलने वाले भुगतान के दबाव को देखते हुए यह सरकारी सहायता पर्याप्त नहीं हो सकती है। जो निवेशक ऐसी कंपनियों में पैसा लगाते हैं जो MSME सप्लायर्स पर बहुत ज़्यादा निर्भर हैं, उन्हें आने वाले समय में इन नई समय-सीमाओं का कंपनियों के वर्किंग कैपिटल और डेट लेवल पर असर देखना होगा।
