सांख्यिकी मंत्रालय की पहली ऑल-इंडिया ट्रेवल रिपोर्ट सामने आई है। इसके अनुसार, भारत में छात्रों का औसत मासिक यात्रा खर्च **₹400** है, जबकि शहरों में यह बढ़कर **₹617** तक पहुंच गया है। रिपोर्ट बताती है कि कामकाजी लोग अभी भी टू-व्हीलर्स पर सबसे ज्यादा निर्भर हैं।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने घरेलू यात्रा पर अपनी पहली विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। यह डेटा इस बात पर नई रोशनी डालता है कि भारत के नागरिक हर दिन कैसे यात्रा करते हैं और उन पर आर्थिक बोझ कितना है।
यात्रा खर्च में बड़ा अंतर
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच यात्रा खर्च में भारी अंतर है। ग्रामीण क्षेत्रों में छात्रों का मासिक खर्च ₹361 है, वहीं शहरी छात्र ₹617 खर्च करने को मजबूर हैं। हालांकि, यात्रा में लगने वाला समय दोनों जगह लगभग समान यानी 22 से 23 मिनट है। दिलचस्प बात यह है कि 90% छात्र अपनी यात्रा 30 मिनट के भीतर पूरी कर लेते हैं, लेकिन शहरों में इसके लिए उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।
कामकाजी लोगों की पसंद और टू-व्हीलर का दबदबा
वर्कफोर्स मोबिलिटी की बात करें तो व्यक्तिगत वाहन (Personal Transport) अभी भी पहली पसंद बने हुए हैं। कामकाजी यात्राओं में 43% हिस्सेदारी टू-व्हीलर्स की है, जो भारतीय ऑटो मार्केट की मजबूती को दर्शाता है। वहीं, सार्वजनिक परिवहन के मामले में महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और दिल्ली जैसे राज्यों में रेल आधारित नेटवर्क का इस्तेमाल सबसे ज्यादा है।
जेंडर और यात्रा का खर्च
सर्वे में यह भी सामने आया कि कामकाजी पुरुष औसतन ₹835 महीना यात्रा पर खर्च करते हैं, जबकि महिलाओं का खर्च ₹533 है। लंबी दूरी की यात्राओं में 70% हिस्सा सामाजिक और धार्मिक पर्यटन का है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर
बढ़ता यात्रा खर्च परिवारों की डिस्पोजेबल इनकम पर सीधा असर डाल रहा है। टू-व्हीलर्स के प्रति दीवानगी से ऑटो और फ्यूल सेक्टर में डिमांड बनी रहने के संकेत हैं। सरकार का यह डेटा भविष्य में बुनियादी ढांचे के विकास और सार्वजनिक परिवहन नीतियों को आकार देने में एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित होगा।
