नवंबर 2025 से लागू हुए नए ESI नियमों ने वेतन (Wage) की परिभाषा बदल दी है। हालांकि इससे दायरे में आने वाले कर्मचारियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन बीमारी और विकलांगता के समय मिलने वाले कैश बेनिफिट्स में कटौती का जोखिम पैदा हो गया है।
वेतन की बदली परिभाषा और असर
Code on Social Security 2020 के तहत 21 नवंबर 2025 से लागू हुए बदलावों का सीधा असर कर्मचारियों की जेब पर पड़ सकता है। पहले वेज बेस में तमाम अलाउंसेज जुड़े होते थे, जिससे बीमारी या मैटरनिटी के दौरान मिलने वाला मुआवजा कर्मचारी की आय के हिसाब से काफी रहता था। अब नए नियमों में HRA और कन्वेंस अलाउंस जैसे घटकों को वेज बेस से बाहर कर दिया गया है।
बेनिफिट्स में हो सकती है 25% तक की गिरावट
ESI के नकद फायदे इसी वेज बेस के प्रतिशत पर आधारित होते हैं। वेज बेस का दायरा घटने से मुआवजे की रकम सीधे तौर पर कम हो सकती है। कुछ सैलरी स्ट्रक्चर में तो यह गिरावट 25% या उससे भी ज्यादा हो सकती है। हालांकि सरकार ने 50% ऐड-बैक का प्रावधान दिया है, लेकिन सामान्य सैलरी स्ट्रक्चर में यह बफर काम नहीं आता, जिससे कर्मचारियों को लंबे समय की बीमारी या विकलांगता की स्थिति में कम पैसा मिलने का खतरा बढ़ गया है।
कंपनियों के लिए क्या हैं चुनौतियां?
यह बदलाव सिर्फ कर्मचारियों के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय कंपनियों के लिए भी पेरोल और अनुपालन (Compliance) के मोर्चे पर बड़ा बदलाव है। कंपनियों को अब अपने इंटरनल सिस्टम को नए वेज स्ट्रक्चर के साथ अलाइन करना होगा, जिससे उनके सोशल सिक्योरिटी कंट्रीब्यूशन की देनदारी में भी बदलाव आ सकता है। अब बाजार की नजर इस बात पर है कि ESI कॉर्पोरेशन कैसे स्कीम की वित्तीय सेहत और कर्मचारियों की सुरक्षा के बीच संतुलन बैठाती है। मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों पर इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिल सकता है।
