नेपाल में आई भीषण बाढ़ ने तबाही मचा दी है। इस आपदा में लगभग **1,000** लोगों की जान गई है और **14** बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं, जिसमें Upper Trishuli-1 प्लांट भी शामिल है। इस घटना ने IFC और ADB जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के 'क्लाइमेट-रिस्क मॉडल्स' की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
तबाही का मंजर
26 अगस्त 2026 को आई बर्फीली चट्टानों की सुनामी और उसके बाद आई बाढ़ ने नेपाल में भारी कहर बरपाया है। 1 सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक, मरने वालों की संख्या 990 के करीब पहुंच गई है और 3,900 से ज्यादा लोग लापता हैं। लेंडे खोला (Lhende Khola) नदी के बांध के टूटने से पैदा हुई इस स्थिति ने नेपाल की ऊर्जा क्षमता के 10% हिस्से को ठप कर दिया है।
संकट में फंसी बड़ी फंडिंग
सबसे बड़ी चिंता का विषय Upper Trishuli-1 प्रोजेक्ट है, जिसका निर्माण कार्य 84% पूरा हो चुका था। इसमें International Finance Corporation (IFC) के नेतृत्व में $453 मिलियन का बड़ा कर्ज निवेश किया गया है, जिसमें Asian Development Bank (ADB) का भी सहयोग है। सुरंगों में मजदूरों के फंसने और प्लांट के स्ट्रक्चरल डैमेज ने सुरक्षा मानकों को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
इकोलॉजिकल रिस्क और विवाद
विशेषज्ञों का कहना है कि लेंडर्स ने हिमालयन क्षेत्र में Glacial Lake Outburst Floods (GLOFs) के खतरे की चेतावनी को नजरअंदाज किया। इतना ही नहीं, Green Climate Fund (GCF) की आलोचना इसलिए हो रही है क्योंकि नेपाल के लिए प्रस्तावित बाढ़ सुरक्षा प्रोजेक्ट को मंजूरी देने में 7 साल की देरी की गई।
आगे क्या होगा?
यह आपदा अब महज एक इंफ्रास्ट्रक्चर क्राइसिस नहीं रही, बल्कि 'क्लाइमेट जस्टिस' और जवाबदेही की अंतरराष्ट्रीय बहस बन गई है। अब निवेशक इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि भविष्य में हिमालयी प्रोजेक्ट्स के लिए 'रिस्क प्राइसिंग' और पर्यावरणीय सुरक्षा नियमों में कितनी सख्ती बरती जाती है।
