शहरों के बढ़ते तापमान को कम करने के लिए शुरू की गई Nagar Van Yojana अब एक बड़े वित्तीय संकट से जूझ रही है। सरकारी ग्रांट केवल शुरुआत के लिए काफी है, लेकिन लॉन्ग-टर्म मेंटेनेंस के लिए अब मॉडल बदलने की तैयारी है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2020 में शुरू की गई 'नगर वन योजना' का उद्देश्य घनी आबादी वाले शहरों में 'ग्रीन बफर' बनाना था। हालांकि, National Compensatory Afforestation Fund (CAMPA) के जरिए मिली शुरुआती ग्रांट से प्रोजेक्ट्स तो शुरू हो गए, लेकिन इनके लॉन्ग-टर्म अस्तित्व पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं।
ऑपरेश्नल सस्टेनेबिलिटी का गैप
इस प्रोग्राम का पूरा ढांचा 'वन-टाइम' कैपिटल ग्रांट पर टिका है। यह पैसा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए तो ठीक है, लेकिन पेड़ों की देखरेख, पानी और स्टाफ के खर्च के लिए कोई भी रिकरिंग बजट नहीं है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में यह समस्या साफ दिखती है, जहां शुरुआती ग्रांट खत्म होने के बाद साइट्स बदहाल हो रही हैं।
इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टाफ पर असर
फंड की कमी का सीधा असर साइट्स के फिजिकल हाल पर पड़ रहा है। कई जगहों पर पानी के पंप खराब पड़े हैं, तो कहीं ग्राउंड स्टाफ की सैलरी में देरी हो रही है। बिना रेगुलर फंडिंग के, नए लगाए गए पौधे या तो सूख रहे हैं या जानवरों का शिकार हो रहे हैं, जिससे सरकार द्वारा किया गया शुरुआती कैपिटल इन्वेस्टमेंट बेकार जा रहा है।
सेल्फ-सस्टेनिंग मॉडल की ओर कदम
इन समस्याओं को देखते हुए अब हाइब्रिड रेवेन्यू मॉडल पर जोर दिया जा रहा है। उज्जैन और भोपाल जैसे शहरों ने मिसाल पेश की है कि मामूली 'एंट्री फीस' लगाकर भी मेंटेनेंस और स्टाफ की सैलरी का खर्च निकाला जा सकता है। इसके अलावा, बफर जोन में बायोमास कलेक्शन जैसे तरीकों से स्थानीय लोगों को जोड़कर भी कमाई की जा रही है।
भविष्य की पॉलिसी
अब नीति निर्माता 'टू-स्टेज अप्रोच' पर विचार कर रहे हैं। इसमें CAMPA ग्रांट को मल्टी-इयर मेंटेनेंस शेड्यूल से जोड़ा जाएगा और परफॉरमेंस इंस्पेक्शन को अनिवार्य बनाया जाएगा। योजना यह है कि शुरुआत के बाद इन जंगलों की जिम्मेदारी 'जॉइंट मैनेजमेंट कमेटियों' को सौंपी जाए, जिससे सरकारी दखल और स्थानीय कंट्रोल के बीच संतुलन बना रहे और शहरों को बढ़ती गर्मी से राहत मिल सके।
