सरकार अब National Pension System (NPS) में निवेश की फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ाने पर काम कर रही है। 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाले नए शुल्क ढांचे के बीच, रेगुलेटर्स चाहते हैं कि सब्सक्राइबर्स डिफॉल्ट विकल्पों से आगे बढ़कर बेहतर रिटर्न के लिए अपनी प्लानिंग करें।
1 अक्टूबर 2026 से नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) में नए नियमों का दौर शुरू हो रहा है। इसके तहत अब ₹200 का ऑनबोर्डिंग शुल्क और सालाना 0.20% का AUM (एसेट्स अंडर मैनेजमेंट) चार्ज लिया जाएगा। इन बदलावों के साथ ही, डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज ने निवेश की फ्लेक्सिबिलिटी की समीक्षा करने का निर्देश दिया है। सेक्रेटरी संजय लोहिया का मानना है कि बड़ी संख्या में सब्सक्राइबर्स आज भी सिर्फ 'डिफॉल्ट' निवेश विकल्पों में ही बने हुए हैं, जो लंबे समय में उनके रिटायरमेंट फंड की ग्रोथ को सीमित कर सकते हैं।
आंकड़ों की जुबानी (Current Status)
NPS का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। 9 अगस्त 2026 तक, इसके तहत कुल AUM ₹17.7 लाख करोड़ तक पहुंच चुका है और इसके 2.29 करोड़ सब्सक्राइबर्स हैं। हालांकि, चिंता का विषय यह है कि कई युवा निवेशक भी बिना सोचे-समझे डिफॉल्ट फंड्स में ही निवेश जारी रखते हैं। वे इक्विटी जैसे हाई-ग्रोथ विकल्पों का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं, जिससे बढ़ती महंगाई को मात देने में दिक्कत हो सकती है।
क्या है सरकार का प्लान?
इस समस्या को दूर करने के लिए PFRDA (पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी) एक नया 'सुटेबिलिटी प्लेटफॉर्म' तैयार कर रही है। यह सिस्टम निवेशकों के रिस्क प्रोफाइल के आधार पर उन्हें निवेश के सही सुझाव देगा। सरकार का लक्ष्य अगले 4 से 5 साल में 30 से 40 करोड़ नए सब्सक्राइबर्स को NPS और अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) से जोड़ना है।
भविष्य की चुनौतियां
भारत में पेंशन रिप्लेसमेंट रेट अभी 35-40% के आसपास है, जो वैश्विक औसत 60% से काफी कम है। सरकार का मकसद पेंशन फंड्स को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में लगाकर आर्थिक मजबूती देना है, लेकिन इसके लिए यह जरूरी है कि सब्सक्राइबर्स अपने पोर्टफोलियो को समझदारी से मैनेज करें ताकि भविष्य में उनकी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
