National Payments Corporation of India (NPCI) ने UPI ट्रांजेक्शन पर **0.4%** की मर्चेंट फीस लगाने के अपने फैसले को फिलहाल टाल दिया है। यह कदम केरल के व्यापारिक संगठनों के विरोध के बाद उठाया गया है, जिन्होंने फीस के चलते डिजिटल पेमेंट बंद करने की चेतावनी दी थी।
फैसले के पीछे की वजह
NPCI ने 0.4% का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) फिलहाल लागू नहीं करने का निर्णय लिया है। यह नई व्यवस्था 15 अक्टूबर, 2026 से प्रभावी होनी थी, लेकिन अब इसे दिवाली के बाद तक के लिए टाल दिया गया है। यह फैसला उन छोटे दुकानदारों के लिए बड़ी राहत है, जो इस अतिरिक्त शुल्क के बोझ को लेकर काफी चिंतित थे।
क्यों हुआ था विरोध?
केरल के प्रमुख ट्रेड बॉडीज, जैसे Kerala Hotel and Restaurant Association और Kerala Textiles and Garments Dealers Welfare Association, ने साफ कह दिया था कि वे ₹2,000 से ज्यादा के UPI ट्रांजेक्शन स्वीकार नहीं करेंगे। दुकानदारों का तर्क था कि रिटेल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में नेट प्रॉफिट मार्जिन केवल 1% से 5% के बीच रहता है, ऐसे में ग्रॉस टर्नओवर पर लगने वाली फीस उनके मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित करेगी।
क्या है NPCI का नया फ्रेमवर्क?
NPCI का नियम उन P2M (Person-to-Merchant) ट्रांजेक्शन पर लागू होता है जो ₹2,000 से अधिक हैं, जिसमें अधिकतम कैप ₹300 निर्धारित है। हालांकि, उन छोटे वेंडर्स को इससे छूट दी गई है जिनकी मासिक कमाई ₹1 लाख से कम है। इसके बावजूद व्यापारियों का कहना है कि जीएसटी और बढ़ती इनपुट कॉस्ट के दौर में कोई भी नई फीस उनके बिजनेस मॉडल को मुश्किल में डाल देगी।
निवेशकों के लिए आगे की राह
यह स्थगन (deferral) अब रेगुलेटर और व्यापारियों के बीच बातचीत का मौका देगा। निवेशकों को अब NPCI के अगले आधिकारिक अपडेट पर नजर रखनी चाहिए कि क्या वे फीस स्ट्रक्चर या ट्रांजेक्शन लिमिट में कोई बदलाव करते हैं या नहीं। भारत में डिजिटल पेमेंट की रफ्तार बनी रहेगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि छोटे व्यापारी इस डिजिटल इकोसिस्टम में कितनी सहजता से बने रहते हैं।
