इकोनॉमिस्ट NK Singh ने नए GDP बेस-इयर (2022-23) का बचाव करते हुए ग्रोथ डेटा में हेरफेर के दावों को खारिज किया है। उनका कहना है कि 'डबल-डिफ्लेशन' तकनीक से सेक्टर की उत्पादकता का बेहतर आकलन होगा, हालांकि निवेशकों को अब पुराने डेटा से तुलना करने में सावधानी बरतनी होगी।
इकोनॉमिक ग्रोथ के नए आंकड़ों और बेस-इयर के बदलाव को लेकर छिड़ी बहस के बीच, इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ के प्रेसिडेंट NK Singh ने मोर्चा संभाल लिया है। उन्होंने उन तमाम अटकलों को पूरी तरह खारिज किया है जिनमें कहा जा रहा था कि नई मेथडोलॉजी से ग्रोथ नंबर्स को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है।
क्या है 'डबल-डिफ्लेशन' का गणित?
इस नए बदलाव के केंद्र में 'डबल-डिफ्लेशन' मेथड है। पहले की तुलना में यह तरीका कहीं ज्यादा बारीकी से काम करता है। अब सरकार कच्चे माल (Raw Materials) की लागत और तैयार माल की कीमतों को अलग-अलग एडजस्ट करती है। इससे मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर में असल उत्पादकता की तस्वीर साफ हो जाती है। NK Singh के मुताबिक, यह तरीका संयुक्त राष्ट्र के 'SNA2008' ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के अनुरूप है।
डेटा में बड़ा बदलाव
नए मानकों के लागू होने के बाद नेशनल अकाउंट्स में बड़े बदलाव दिखे हैं। उदाहरण के लिए, Q1 FY26 की GDP अब ₹80 लाख करोड़ आंकी गई है, जो पुरानी 2011-12 सीरीज के तहत ₹86.05 लाख करोड़ थी। वहीं, Q1 FY27 के लिए वास्तविक GDP ग्रोथ रेट 7.8% दर्ज की गई है।
निवेशकों के लिए चुनौतियां
इन्वेस्टर्स और बाजार के जानकारों के लिए यह एक 'ऐप्पल-टू-ऑरेंज' (Apples-to-oranges) जैसी स्थिति है। पुरानी सीरीज और नई सीरीज की तुलना सीधे तौर पर नहीं की जा सकती क्योंकि दोनों का स्ट्रक्चर अलग है। अब ब्रोकरेज हाउसेस को ग्रोथ प्रोजेक्शंस और फिस्कल डेफिसिट (Fiscal Deficit) के मॉडल्स को नए सिरे से तैयार करना होगा, क्योंकि नोमिनल GDP का बेस अब बदल चुका है। बाजार की नजर अब इस पर है कि सरकार और सेंट्रल बैंक भविष्य की पॉलिसी रिव्यूज में इन आंकड़ों को कैसे पेश करते हैं।
