NITI Aayog ने अपनी नई रिपोर्ट में देश के रिसर्च सेक्टर की पोल खोल दी है। भारत में R&D पर खर्च GDP का महज **0.65%** है। सरकार ने प्रशासनिक देरी को कम करने और प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी बढ़ाने का सुझाव दिया है, जो फार्मा और टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
NITI Aayog की हालिया रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है "Ease of Doing Research & Development in India," ने उन स्ट्रक्चरल चुनौतियों को सामने रखा है जो भारत के इनोवेशन को रोक रही हैं। ग्लोबल लीडर्स की बात करें तो अमेरिका अपनी GDP का 3.5% और दक्षिण कोरिया 4.5% R&D पर खर्च करता है, जबकि भारत का आंकड़ा सालों से 0.65% पर ही टिका हुआ है।
फंड का गलत बंटवारा
रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ फंड की कमी ही मुद्दा नहीं है, बल्कि उसका असमान वितरण भी एक बड़ी बाधा है। Anusandhan National Research Foundation (ANRF) का लगभग 80% फंड केवल IITs में जा रहा है। इस कारण अन्य स्टेट यूनिवर्सिटीज और रिसर्च सेंटर्स पुरानी लैब और खराब उपकरणों से जूझ रहे हैं, जिससे रिसर्च का स्तर गिर रहा है।
नौकरशाही की मार
रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि वैज्ञानिकों को फंड पाने के लिए 3 से 6 महीने तक का लंबा इंतजार करना पड़ता है। जटिल प्रोक्योरमेंट रूल्स और सरकारी एजेंसियों के बीच खराब कम्युनिकेशन ने वैज्ञानिकों का भरोसा तोड़ा है।
क्या है सरकार का मास्टर प्लान?
NITI Aayog ने अब "Unified Architecture for Project Management System" का सुझाव दिया है। इस प्लेटफॉर्म के जरिए ग्रांट्स को एक परमानेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर से ट्रैक किया जाएगा। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और फंडिंग की डुप्लीकेसी रुकेगी।
निवेशकों के लिए क्यों जरूरी?
भारत में अभी भी कुल R&D खर्च का 64% हिस्सा सरकारी संस्थानों से आता है। अगर ये सुधार लागू होते हैं और प्राइवेट सेक्टर का इन्वेस्टमेंट बढ़ता है, तो फार्मा, केमिकल, रिन्यूएबल एनर्जी और आईटी सेक्टर की कंपनियां अपनी टेक्नोलॉजी को तेजी से कमर्शियलाइज कर पाएंगी। निवेशकों की नजर अब इस पर होगी कि क्या सरकार इन सुझावों को कितनी जल्दी हकीकत में बदलती है।
