NITI Aayog ने शिक्षा और स्किलिंग प्रोग्राम्स के नतीजों को पारदर्शी बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। थिंक टैंक ने 'नेशनल करियर आउटकम रिपॉजिटरी' (National Career Outcome Repository) का प्रस्ताव दिया है, जिसका मकसद छात्रों को मिलने वाली नौकरी, उनकी सैलरी और प्लेसमेंट से जुड़ी जानकारी को वेरिफाई करना है।
आखिर क्यों उठी इस 'रिपॉजिटरी' की जरूरत?
NITI Aayog की 'Reimagining Skilling for Viksit Bharat@2047' रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी भी शिक्षा और नौकरी की दुनिया के बीच तालमेल बिठाना एक बड़ी चुनौती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बहुत कम ग्रेजुएट्स ऐसी नौकरियां कर पाते हैं जो उनकी पढ़ाई से सीधे तौर पर मेल खाती हों। इसी गैप को पाटने के लिए NITI Aayog एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाने का सुझाव दे रहा है, जहां अलग-अलग संस्थानों और ट्रेनिंग प्रोग्राम्स से जुड़ी प्लेसमेंट, सैलरी और जॉब रोल की जानकारी को वेरिफाई किया जा सके। इसका सीधा मतलब है कि अब सिर्फ 'कितने लोगों को नौकरी मिली' यह नहीं, बल्कि 'कितनी अच्छी नौकरी मिली और कितनी सैलरी मिली' इस पर फोकस किया जाएगा।
एजुकेशन और एड-टेक कंपनियों पर क्या होगा असर?
यह प्रस्ताव एजुकेशन और एड-टेक (Ed-Tech) सेक्टर में निवेशकों और बाजार पर नजर रखने वालों के लिए एक बड़ा संकेत है। अगर यह लागू होता है, तो सरकारी और प्राइवेट संस्थानों पर अपने छात्रों की सैलरी रेंज, इंटर्नशिप रेट्स और करियर की ग्रोथ से जुड़े रियल डेटा को सामने रखने का दबाव बढ़ेगा। अभी तक यह सेक्टर काफी बिखरा हुआ है, जहां प्लेसमेंट के आंकड़े अक्सर संस्थानों द्वारा खुद ही बताए जाते हैं, जिनकी सच्चाई अलग हो सकती है। एक सरकारी प्लेटफॉर्म छात्रों, अभिभावकों और कंपनियों को सही जानकारी देगा, जिससे अच्छे संस्थानों और कम प्रभावी संस्थानों के बीच फर्क करना आसान हो जाएगा।
प्राइवेट स्किलिंग कंपनियों और ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट्स के बिजनेस मॉडल पर भी इसका असर पड़ सकता है। जो कंपनियां अपने मजबूत और वेरिफाइड प्लेसमेंट रिकॉर्ड्स को साबित कर पाएंगी, उन्हें फायदा होगा। वहीं, जो सिर्फ मार्केटिंग पर ज्यादा ध्यान देती हैं और असल नतीजों को छिपाती हैं, उन पर जांच का दायरा बढ़ सकता है। इस रिपॉजिटरी को एक बड़े डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बनाने की योजना है, जो शायद 'स्किल्स डिजिटल रजिस्ट्री' (Skills Digital Registry) जैसे अन्य सिस्टम से भी जुड़ेगा।
क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि, इस प्रस्ताव को लागू करने में बड़ी चुनौतियां भी हैं। लाखों छात्रों और सैकड़ों संस्थानों से एक जैसा डेटा इकट्ठा करना एक टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। यह देखना होगा कि सरकार डेटा प्राइवेसी (Data Privacy) जैसे मुद्दों से कैसे निपटती है और क्या यह रिपोर्टिंग वॉलंटरी (Voluntary) होगी या मैंडेटरी (Mandatory)। यह भी संभव है कि कुछ संस्थान अपने प्लेसमेंट के आंकड़े सार्वजनिक करने में हिचकिचाएं। साथ ही, कंपनियों को भी नए कर्मचारियों की जानकारी वेरिफाई करनी होगी, तभी यह सिस्टम पूरी तरह से काम कर पाएगा।
निवेशकों और हितधारकों को इस पर आगे की जानकारी पर नजर रखनी चाहिए, जैसे कि क्या कोई पायलट प्रोजेक्ट शुरू होता है या संस्थानों को किसी खास तरह के वेरिफिकेशन को अनिवार्य करने के आदेश आते हैं। यह रिपॉजिटरी भारत की वर्कफोर्स की एम्प्लॉयबिलिटी (Employability) को बेहतर बनाने की सरकार की लंबी अवधि की रणनीति का एक अहम हिस्सा साबित हो सकती है।
