National Institute of Public Finance and Policy (NIPFP) की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि साल 2022 के अंत से लॉन्ग-टर्म सरकारी बॉन्ड यील्ड अब महंगाई के आंकड़ों पर पहले की तरह प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। यह बदलाव RBI की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) की प्रभावशीलता के लिए एक नई पहेली बन गया है, खासकर जब रेपो रेट को **5.50%** तक बढ़ाया जा चुका है।
बॉन्ड मार्केट में आया बड़ा बदलाव
NIPFP की हालिया वर्किंग पेपर, जिसका शीर्षक 'Artificial Intelligence and the Indian Sovereign Yield Curve' है, ने भारतीय डेट मार्केट के व्यवहार में एक संरचनात्मक बदलाव (Structural Shift) को रेखांकित किया है। अध्ययन के अनुसार, अब लॉन्ग-टर्म सरकारी बॉन्ड की यील्ड महंगाई दर और मनी सप्लाई के प्रति कम संवेदनशील हो गई है।
आमतौर पर, महंगाई बढ़ने पर बॉन्ड यील्ड में उछाल आता है क्योंकि निवेशक अपनी क्रय शक्ति (Purchasing Power) को बनाए रखने के लिए अधिक रिटर्न मांगते हैं। लेकिन अब यह संबंध कमजोर पड़ता दिख रहा है। दूसरी ओर, शॉर्ट-टर्म डेट इंस्ट्रूमेंट्स मैक्रो-इकोनॉमिक बदलावों पर काफी तेजी से रिएक्ट कर रहे हैं, जिससे यील्ड कर्व में एक बड़ा अंतर (Divergence) पैदा हो गया है।
RBI की चिंता क्यों बढ़ी?
RBI ने अक्टूबर 2026 की बैठक में रेपो रेट को 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़ाकर 5.50% कर दिया था। सेंट्रल बैंक का मुख्य उद्देश्य महंगाई को काबू करना है, जो कि मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए 5.2% अनुमानित है। केंद्रीय बैंक की पूरी मौद्रिक नीति इस भरोसे पर टिकी है कि दरें बढ़ाने का असर कॉर्पोरेट और पर्सनल लोन तक पहुंचेगा। यदि लॉन्ग-टर्म बॉन्ड यील्ड इन फैसलों पर उम्मीद के मुताबिक रिएक्ट नहीं करते हैं, तो पॉलिसी ट्रांसमिशन (Policy Transmission) की भविष्यवाणी करना मुश्किल हो जाता है।
क्या है इसके पीछे की वजह?
रिसर्चर्स का मानना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
- AI का बढ़ता दखल: फाइनेंशियल फोरकास्टिंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल लिक्विडिटी मैनेजमेंट और रिस्क प्राइसिंग के तरीके को बदल रहा है।
- ग्लोबल झटके: यह दौर वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता का रहा है, जिसमें महामारी के बाद स्टिमुलस की वापसी, वेस्ट एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव शामिल हैं।
निवेशकों के लिए सबक
बाजार के जानकारों के लिए यह स्थिति अनिश्चितता पैदा करती है। सरकारी उधारी की लागत अब सिर्फ महंगाई के आंकड़ों से तय नहीं हो रही, बल्कि इसमें कई अन्य जटिल फैक्टर्स शामिल हो गए हैं। मार्केट पार्टिसिपेंट्स के लिए अब RBI की लिक्विडिटी पॉलिसी, ग्लोबल ऑयल प्राइसेज और विदेशी निवेशकों के फ्लो पर नजर रखना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
