National Federation of Indian Railwaymen (NFIR) ने 8th Pay Commission के सामने ₹69,000 के न्यूनतम वेतन और 3.833 फिटमेंट फैक्टर की मांग रखी है। इस प्रस्ताव से सरकार के खर्च और फिस्कल डेफिसिट पर बड़ा असर पड़ सकता है।
मांगों का ब्योरा
नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन (NFIR) ने अपनी मांगों को 8th Pay Commission के समक्ष रखा है। रेलवे कर्मचारियों के लिए ₹69,000 के न्यूनतम वेतन के अलावा, यूनियन ने 3.833 का फिटमेंट फैक्टर मांगा है। यह फैक्टर नए वेतनमान तय करने के लिए एक मुख्य आधार होता है। इसके साथ ही, एनुअल इंक्रीमेंट को 3% से बढ़ाकर 6% करने और कम से कम ₹10,000 का मिनिमम फाइनेंशियल बेनिफिट देने की भी मांग की गई है।
पेंशन और करियर ग्रोथ
यूनियन ने करियर में कम से कम 5 प्रमोशन अनिवार्य करने का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा, पेंशन स्ट्रक्चर को बेहतर बनाते हुए इसे अंतिम वेतन का 67% तय करने और डियरनेस अलाउंस (DA) के 25% पर पहुंचते ही उसे बेसिक पे में मर्ज करने की मांग की गई है। कम्यूटेशन की अवधि को 15 साल से घटाकर 11 साल करने का भी सुझाव दिया गया है।
अर्थव्यवस्था और निवेशकों के लिए संकेत
आर्थिक दृष्टिकोण से यह मांगें काफी अहम हैं क्योंकि सरकारी वेतन बिल देश के कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा है। वेतन में भारी बढ़ोतरी का सीधा असर फिस्कल डेफिसिट पर पड़ता है। निवेशकों की नजर इस बात पर है कि सरकार वेतन और पेंशन के खर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले खर्च के बीच कैसे संतुलन बिठाती है।
चूंकि भारतीय रेलवे एक बहुत बड़ा नियोक्ता है, इसलिए यहां लिया गया कोई भी फैसला अन्य सरकारी विभागों के लिए एक बेंचमार्क बन जाता है। यदि सरकार इन मांगों को मानती है, तो इससे कर्मचारियों की डिस्पोजेबल इनकम बढ़ेगी, जिससे कंज्यूमर गुड्स की मांग में इजाफा हो सकता है, लेकिन साथ ही वित्त मंत्रालय पर बजट लक्ष्यों को पूरा करने का दबाव भी बढ़ सकता है।
