ताजा NFHS-6 रिपोर्ट (2023-24) के मुताबिक, देश में महिलाओं की स्कूल अटेंडेंस बढ़कर **73.7%** हो गई है। महिलाएं हायर सेकेंडरी शिक्षा में पुरुषों से आगे निकल गई हैं, लेकिन आर्थिक विकास और सामाजिक विकास के बीच अब भी बड़ी असमानता बरकरार है।
आर्थिक और सामाजिक विरोधाभास
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा मई 2026 में जारी इस सर्वे ने सामाजिक संकेतकों की तस्वीर साफ कर दी है। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर महिला शिक्षा में सुधार हुआ है, लेकिन आर्थिक रूप से समृद्ध राज्यों में भी शिक्षा की असमानता चिंता का विषय बनी हुई है। तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्यों में महिला शिक्षा और संपत्ति के अधिकार को लेकर चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि संसाधनों का असमान वितरण लंबे समय में ह्यूमन कैपिटल डेवलपमेंट पर बुरा असर डाल सकता है, जो देश की प्रोडक्टिविटी के लिए जरूरी है।
डिजिटल क्रांति और डेटा में बदलाव
सर्वे का सबसे सकारात्मक पहलू डिजिटल कनेक्टिविटी में आया उछाल है। महिलाओं के बीच इंटरनेट का उपयोग 33.2% (NFHS-5) से बढ़कर 64.3% (NFHS-6) तक पहुंच गया है, जो लेबर फोर्स में उनकी भागीदारी के लिए एक बड़ा कदम है। हालांकि, सर्वे के स्ट्रक्चर में बदलाव भी हुए हैं। इंडिकेटर्स की संख्या 131 से घटाकर 101 कर दी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि एनीमिया, शिशु मृत्यु दर और जन्म के समय लिंग अनुपात जैसे जरूरी डेटा न होने से सोशल वेलफेयर स्कीम्स की प्रभावशीलता को ट्रैक करना मुश्किल हो सकता है।
गवर्नेंस और भविष्य की राह
विकास का अगला चरण पंचायती राज संस्थानों और लोकल सेल्फ-हेल्प ग्रुप्स के एकीकरण पर निर्भर करेगा। आंगनवाड़ी वर्कर्स और हेल्थ एक्टिविस्ट्स जैसे फ्रंटलाइन वर्कफोर्स को मजबूत करना आने वाले समय की प्राथमिकता होगी। इन्वेस्टर और पॉलिसी मेकर्स के लिए यह डेटा यह समझने के लिए अहम है कि कैसे क्षेत्रीय असंतुलन को दूर कर देश की लॉन्ग-टर्म इकोनॉमिक पोटेंशियल और वर्कफोर्स रेडीनेस को बढ़ाया जा सकता है।
