लोकसभा में NDA की ताकत में इजाफा हुआ है। 2024 चुनाव के बाद सीटों का आंकड़ा **293** से बढ़कर अब **319** हो गया है। पार्टी बदलने के कारण आए इस बदलाव पर निवेशकों की नजरें हैं क्योंकि इसका सीधा असर पॉलिसी स्टैबिलिटी (Policy Stability) पर पड़ता है।
आंकड़ों का खेल और बदलती राजनीति
हालिया राजनीतिक उठापटक के बाद NDA की लोकसभा में सीटों की संख्या 319 हो गई है, जो 2024 के चुनावों में मिली 293 सीटों से काफी ज्यादा है। इस बदलाव में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और तृणमूल कांग्रेस (Trinamool Congress) के पूर्व सदस्यों की अहम भूमिका रही है। इन्वेस्टर्स के लिए यह एक महत्वपूर्ण घटना है, क्योंकि सरकार की आर्थिक बिल पास करने की क्षमता और पॉलिसी कंसिस्टेंसी (Policy Consistency) काफी हद तक इसी नंबर गेम पर निर्भर करती है।
दलबदल कानून और संवैधानिक पेच
ये बदलाव अक्सर संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत किए गए हैं, जो दो-तिहाई बहुमत होने पर पार्टी विलय को मंजूरी देती है। ADR के डेटा के मुताबिक, 2022 से 2026 के बीच देश भर में 100 से ज्यादा विधायकों ने दल बदले हैं। हालांकि, इस ट्रेंड पर दलबदल कानून की मंशा को लेकर काफी बहस छिड़ी है, जो वोटर के जनादेश पर सवाल खड़े करती है।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
बाजार की नजर इस बात पर है कि क्या सरकार बिना किसी रुकावट के रिफॉर्म्स और बजट जैसे अहम फैसले ले पाएगी। फिलहाल, गठबंधन 2/3 बहुमत से दूर है, जो संविधान संशोधन के लिए जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट में दलबदल से जुड़े कई मामले लंबित हैं, जो कानूनी अनिश्चितता पैदा करते हैं। निवेशकों को अब कोर्ट के फैसलों और एंटी-डिफेक्शन लॉ (Anti-defection Law) में किसी भी बदलाव पर कड़ी नजर रखनी होगी, क्योंकि यही भविष्य में भारत के गवर्नेंस स्ट्रक्चर की स्थिरता तय करेंगे।
