मध्य और पूर्वी भारत से दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की वापसी की प्रक्रिया रुक गई है। इस बार सीजन में लॉन्ग-पीरियड एवरेज (LPA) की तुलना में केवल **87%** बारिश ही दर्ज की गई है, जो रबी फसलों और महंगाई के लिहाज से अहम है।
भारत में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की विदाई का सिलसिला मध्य और पूर्वी भारत में अस्थायी रूप से ठहर गया है। आधिकारिक तौर पर मॉनसून सीजन 30 सितंबर को समाप्त हो गया है, लेकिन विदाई की लाइन अभी भी कई इलाकों में अटकी हुई है। अक्टूबर की शुरुआत तक सुपौल, रांची और रायपुर जैसे क्षेत्रों से मॉनसून वापस लौट चुका है, लेकिन अब ध्यान पूर्वोत्तर मॉनसून (Northeast Monsoon) पर टिक गया है।
इकोनॉमी पर असर (Economic Implications)
इस सीजन में बारिश का आंकड़ा LPA के मुकाबले 87% रहने से राज्यों में नमी की कमी देखी गई है। कृषि क्षेत्र के लिए आने वाले दिन काफी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दक्षिण प्रायद्वीपीय (South Peninsula) इलाकों में अभी भी पर्याप्त पानी की जरूरत है। वाटर रिजर्वोयर का स्तर बना रहना सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए बहुत जरूरी है, जो सीधे तौर पर आने वाली सर्दियों की फसलों को प्रभावित करेगा।
बाजार के जानकारों का मानना है कि मॉनसून का कमजोर प्रदर्शन फूड इन्फ्लेशन और ग्रामीण मांग (Rural Demand) पर दबाव डाल सकता है। दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की पैदावार पर असर पड़ने से कमोडिटी की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
IMD की नजर
इंडिया मेट्रोलॉजिकल डिपार्टमेंट (IMD) अब हवाओं के रुख पर नजर बनाए हुए है। दक्षिण-पश्चिम से पूर्वी हवाओं की ओर यह बदलाव पूर्वोत्तर मॉनसून के आने का संकेत है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे तटीय राज्यों के लिए यह बारिश जीवनरेखा के समान है। अगले कुछ हफ्ते यह तय करेंगे कि सर्दियों की बुवाई के लिए पानी की उपलब्धता कैसी रहती है और इसका असर सप्लाई चेन पर क्या होगा।
