भारत में मानसून अपने आधे सफर पर है और अल नीनो (El Nino) के बढ़ते प्रभाव के चलते इसके पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब तक जहाँ मध्य और पश्चिमी भारत में अच्छी बारिश होती थी, वहीं अब बारिश उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों की ओर खिसक गई है। इस बदलाव पर निवेशकों की पैनी नजर है क्योंकि यह कृषि उत्पादन, ग्रामीण मांग और कमोडिटी की कीमतों को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है।
मानसून का भौगोलिक बदलाव
ग्लोबल क्लाइमेट मॉडल्स (Global Climate Models) के अनुसार, अल नीनो (El Nino) का प्रभाव मजबूत हो रहा है। इसी के चलते, भारतीय मानसून की बारिश का मुख्य क्षेत्र, जो आमतौर पर मध्य और पश्चिमी भारत होता है, अब कमजोर पड़ने की आशंका है। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि बारिश अब हिमालय की तलहटी और पूर्वोत्तर राज्यों की ओर बढ़ेगी।
क्षेत्रीय प्रभाव और खेती-किसानी का हाल
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की रिपोर्ट के अनुसार, मानसून ट्रफ (Monsoon Trough) यानी कम दबाव का क्षेत्र, जो भारत में बारिश लाता है, अब पूर्व की ओर मणिपुर की तरफ खिसक गया है। इस बदलाव की वजह से बंगाल की खाड़ी से आने वाले नमी वाले बादल अब कम पहुंच पा रहे हैं। नतीजतन, बारिश का फोकस जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश व बिहार के मैदानी इलाकों की ओर शिफ्ट हो गया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए, राष्ट्रीय औसत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि बारिश कहाँ और कितनी हो रही है। मध्य और पश्चिमी भारत, जहाँ सोयाबीन, दालें और कपास जैसी फसलें मुख्य रूप से उगाई जाती हैं, में बारिश की कमी उत्पादन पर असर डाल सकती है। वहीं, उत्तरी और पूर्वी क्षेत्रों में बढ़ी हुई नमी चावल और अन्य खरीफ फसलों (Kharif Crops) की पैदावार के लिए फायदेमंद हो सकती है। निवेशक इन मानसून पैटर्न पर बारीक नजर रखते हैं क्योंकि ये सीधे तौर पर ग्रामीण आय, उपभोक्ता वस्तुओं की मांग और खाद्य पदार्थों की कीमतों को प्रभावित करते हैं।
आने वाले दिनों में बारिश का अनुमान
अगले हफ्ते देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम मिला-जुला रहने की उम्मीद है। पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई दिनों तक बारिश की संभावना है। वहीं, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, ओडिशा और झारखंड सहित पूर्वी भारत में भी व्यापक बारिश की आशंका है। इसके विपरीत, मध्य भारत के कुछ हिस्सों, जैसे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बारिश का अनुमान काफी बिखरा हुआ है, जो इन क्षेत्रों में मिट्टी की नमी को प्रभावित कर सकता है।
जैसे-जैसे मानसून अगस्त और सितंबर में आगे बढ़ेगा, निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन क्षेत्रीय बदलावों का खड़ी फसलों के रकबे और स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है। अगर प्रमुख कृषि राज्यों में लंबे समय तक पानी की कमी रहती है, तो कृषि वस्तुओं की कीमतों पर दबाव आ सकता है और सरकार को निर्यात या घरेलू आपूर्ति प्रबंधन पर नीतियां बदलनी पड़ सकती हैं। बाजार के भागीदार मानसून के अंतिम प्रभाव का आकलन करने के लिए IMD के अगले अपडेट्स और फसल कटाई के आंकड़ों पर निर्भर करेंगे।
