प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की मुलाकात के बीच वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। Brent crude के **$108** प्रति बैरल के स्तर को पार करने के बाद भारतीय बाजारों में बिकवाली देखने को मिली है, जिससे महंगाई और कॉरपोरेट मुनाफे पर दबाव बढ़ने का डर है।
ब्रिक्स (BRICS) समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के बीच द्विपक्षीय बातचीत हुई। हालांकि चर्चा का केंद्र आर्थिक सहयोग था, लेकिन फाइनेंशियल मार्केट की नजर वेस्ट एशिया की अस्थिरता पर टिकी रही। सप्लाई चेन में बाधाओं के डर से कच्चे तेल की कीमतें $108 के ऊपर निकल गई हैं, जिसने घरेलू इक्विटी बाजार में सतर्कता का माहौल बना दिया है।
बाजार पर असर
11 सितंबर, 2026 को शुरुआती कारोबार में Sensex और Nifty पर दबाव साफ दिखा। भारत दुनिया का एक बड़ा एनर्जी इंपोर्टर है, ऐसे में तेल की कीमतों में उछाल का सीधा असर Trade Deficit, कमजोर रुपया और महंगाई पर पड़ता है। खास तौर पर एविएशन, पेंट्स और लॉजिस्टिक्स जैसे सेक्टर, जो एनर्जी पर अधिक निर्भर हैं, उनकी कॉस्टिंग में तेजी से मुनाफे पर असर पड़ सकता है।
चाबहार पोर्ट और भू-राजनीतिक जोखिम
बातचीत के दौरान चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) पर भी चर्चा हुई। हालांकि यह भारत के लिए सेंट्रल एशिया के व्यापार का मुख्य जरिया है, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों (U.S. sanctions) के कारण फिलहाल इसमें बजटीय अनिश्चितता बनी हुई है। निवेशकों को इस तरह के प्रोजेक्ट्स से जुड़े एग्जीक्यूशन रिस्क को ध्यान में रखना चाहिए।
BRICS करेंसी पर भारत का रुख
आर्थिक मोर्चे पर एक राहत की खबर है। ईरान के राष्ट्रपति 'डी-डॉलरलाइजेशन' (De-dollarization) और वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम के समर्थक हैं, लेकिन भारत ने BRICS की साझा करेंसी बनाने के प्रस्ताव पर बेहद सतर्क रुख अपनाया है। भारत का अपनी मौद्रिक स्वायत्तता (Monetary autonomy) बनाए रखने का फैसला मार्केट के लिए एक स्टेबलाइजर की तरह है, जिसे आर्थिक स्थिरता के लिहाज से बेहतर माना जा रहा है।
फिलहाल, निवेशकों की नजरें कंपनियों के आगामी तिमाही नतीजों (Quarterly Results) पर हैं, ताकि यह देखा जा सके कि वे बढ़ती ईंधन और लॉजिस्टिक्स लागत का सामना कैसे कर रही हैं। अब सबकी निगाहें ग्लोबल ऑयल बेंचमार्क और सरकार के अगले कदमों पर टिकी हैं।
