बाज़ार पर मंडराया West Asia संकट का साया
2 मार्च 2026 को भारतीय शेयर बाज़ारों ने एक तीखी गिरावट का अनुभव किया, जो सीधे तौर पर West Asia में बढ़ते भू-राजनीतिक जोखिमों और कच्चे तेल की कीमतों में आई अप्रत्याशित उछाल से जुड़ा था। इस घटना ने वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण पर भी चिंता की लकीरें खींच दीं। हालाँकि, बाज़ार की यह प्रतिक्रिया अक्सर अल्पकालिक होती है, लेकिन तेल की कीमतों में स्थायी उछाल से भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुँच सकता है।
सेंसेक्स-निफ्टी में क्यों आई तूफानी गिरावट?
सोमवार, 2 मार्च 2026 को भारतीय शेयर सूचकांकों पर भारी बिकवाली का दबाव देखा गया। BSE Sensex 1,710.37 अंक यानी 2.13% गिरकर 78,571.74 पर आ गया, वहीं NSE Nifty 50 भी 476.90 अंक या 1.92% लुढ़ककर 24,388.80 पर बंद हुआ। इस व्यापक गिरावट के चलते BSE में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप लगभग ₹21.90 ट्रिलियन घटकर ₹446.36 ट्रिलियन रह गया। यह बिकवाली वैश्विक संकेतों के अनुरूप थी, जहाँ 1 मार्च 2026 को अमेरिकी बाज़ार भी गिरे थे – Dow Jones 1.39%, S&P 500 1.36% और Nasdaq 1.82% टूटे। वहीं, यूरोपीय देशों में नैचुरल गैस की कीमतें 40% तक उछल गईं। बाज़ार में इस तेज़ गिरावट की सबसे बड़ी वजह West Asia में छिड़ा संघर्ष था, जिसने कच्चे तेल की कीमतों को महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुँचा दिया। Brent क्रूड करीब $85 प्रति बैरल और WTI क्रूड $76 प्रति बैरल के आसपास पहुँच गया। हॉरमज़ जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से आपूर्ति बाधित होने का डर भी बढ़ गया। इस तनाव के कारण India VIX, जो बाज़ार की अपेक्षित अस्थिरता का पैमाना है, 18.43% बढ़कर 20.29 पर पहुँच गया, जो निवेशकों की घबराहट को दर्शाता है।
भारत की तेल पर निर्भरता का गणित
भारत अपनी 70% कच्चे तेल की ज़रूरतें आयात करता है। ऐसे में, कच्चे तेल की कीमतों में मामूली उछाल भी भारत के वार्षिक आयात बिल में करीब $2 बिलियन की वृद्धि कर सकता है। वहीं, कीमतों में 10% की बढ़ोतरी से CPI और WPI महंगाई 40-80 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकती है, और करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) में 30 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार CPI 2.75% और WPI 1.81% पर था, जो नियंत्रण में थे। लेकिन, तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी महंगाई को फिर से भड़का सकती है। इतिहास गवाह है कि भारतीय बाज़ार अक्सर ऐसे भू-राजनीतिक झटकों से उबर जाते हैं। उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान 2022 की पहली छमाही में Nifty लगभग 10% गिरा था, लेकिन यह गिरावट ज़्यादातर सेंटिमेंट-आधारित और अस्थायी साबित हुई। Anand Rathi Research के अनुसार, अकेले भू-राजनीतिक घटनाएँ गहरे या स्थायी बाज़ार सुधार का कारण नहीं बनतीं, बल्कि ऊर्जा के झटके और वैश्विक लिक्विडिटी ज़्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की फरवरी 2026 तक लगातार आठ महीनों से जारी बिकवाली ने बाज़ार की कमजोरी को बढ़ाया है। हालांकि, 2 मार्च 2026 को डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स (DIIs) ने ₹8,593.87 करोड़ की नेट खरीदारी करके कुछ सहारा दिया, जबकि FPIs ने ₹3,295.64 करोड़ की बिकवाली की। इसी बीच, भारतीय रुपया भी दबाव में आकर रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया।
आगे क्या हो सकता है?
Natixis के अनुसार, भारत अपनी कच्चे तेल की ज़रूरतें मुख्य रूप से खाड़ी देशों से पूरी करता है, इसलिए यह संकट उभरते बाज़ारों में सबसे ज़्यादा जोखिम वाली स्थिति है। Societe Generale का मानना है कि तेल आयात पर इस निर्भरता के कारण भारत का प्रदर्शन और भी खराब हो सकता है। यदि यह संघर्ष लंबा खिंचा, तो तेल की कीमतें ऊँची बनी रहेंगी, जिससे आयात बिल बढ़ेगा, CAD पर दबाव आएगा और रुपये में और गिरावट आ सकती है, जो पूंजी के बहिर्वाह (outflows) को और तेज़ कर सकता है। हालाँकि भारत ने ऊर्जा दक्षता में सुधार किया है और आयात स्रोतों में विविधता लाई है, लेकिन एक गंभीर और स्थायी ऊर्जा झटका इन सुधारों को बेअसर कर सकता है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में, जो तेल पर कम निर्भर हैं या जिनके पास घरेलू ऊर्जा उत्पादन ज़्यादा है, भारत की भेद्यता (vulnerability) संस्थागत निवेशकों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। Goldman Sachs का अनुमान है कि Brent क्रूड में 20% की बढ़ोतरी से क्षेत्रीय कंपनियों की कमाई 2% कम हो सकती है। बाज़ार को संरचनात्मक नुकसान तब होगा जब तेल की कीमतों में लगातार उछाल करंट अकाउंट डेफिसिट को बढ़ाएगा और महंगाई को फिर से भड़काएगा।
बाज़ार का भविष्य किस पर निर्भर?
विश्लेषकों की राय बंटी हुई है। कुछ, जैसे BNP Paribas, भारतीय शेयरों के पक्ष में जोखिम/इनाम को बेहतर मानते हैं। वहीं, Pepperstone Group जैसे अन्य विश्लेषक आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता के कारण निरंतर भेद्यता पर प्रकाश डालते हैं। बाज़ार की दिशा West Asia संघर्ष की अवधि और वैश्विक तेल आपूर्ति व कीमतों पर इसके वास्तविक प्रभाव पर निर्भर करेगी। तनाव में कमी आने पर वर्तमान सेंटिमेंट-आधारित बिकवाली से बाज़ार तेज़ी से उबर सकता है। हालाँकि, यदि ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊँची बनी रहती हैं, तो बढ़ता महंगाई दबाव और चौड़ा होता CAD बाज़ार में लंबी मंदी ला सकते हैं, जो बाज़ार की ऐतिहासिक मजबूती को चुनौती देगा। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेल की कीमतों में यह वर्तमान वृद्धि एक अस्थायी भू-राजनीतिक प्रीमियम है या एक स्थायी ऊर्जा झटके की शुरुआत।