भारत को करीब 7 लाख डॉक्टरों की ज़रूरत है, जिसके लिए लगभग 400 नए मेडिकल कॉलेज खोलने होंगे। हर कॉलेज बनाने का अनुमानित खर्च ₹400 करोड़ है, जो एक बड़ी आर्थिक चुनौती है। इस कमी के कारण हज़ारों छात्र हर साल विदेश जाकर करीब ₹7,500 करोड़ खर्च करते हैं, जो देश के अंदर इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को दर्शाता है।
क्यों है डॉक्टरों की इतनी कमी?
भारत का मेडिकल एजुकेशन सेक्टर एक बड़ी सप्लाई-डिमांड की खाई से जूझ रहा है। देश में हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर के लक्ष्य को पाने के लिए करीब 7 लाख अतिरिक्त डॉक्टरों की ज़रूरत है। इस कमी को पूरा करने के लिए, इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, भारत को लगभग 400 नए मेडिकल कॉलेज स्थापित करने होंगे। हर एक नए कॉलेज को बनाने में करीब ₹400 करोड़ की शुरुआती कैपिटल इन्वेस्टमेंट (Capital Investment) लगेगी, और इसमें रोज़मर्रा के खर्च शामिल नहीं हैं।
पैसों की कमी और रिसोर्स का बंटवारा
इन नई सुविधाओं के निर्माण के लिए ज़रूरी भारी-भरकम पूंजी (Capital Spending) राज्य और केंद्र सरकार के बजट पर भारी दबाव डालती है। ऐसे में, प्राथमिक शिक्षा जैसे दूसरे ज़रूरी क्षेत्रों में निवेश के मुकाबले रिसोर्स के बंटवारे को लेकर एक मुश्किल फैसला लेना पड़ता है। 1960 के दशक के मध्य से ही इस इंफ्रास्ट्रक्चर के फंड (Fund) को लेकर पॉलिसी एक्सपर्ट्स (Policy Experts) के बीच बहस चल रही है, लेकिन डॉक्टरों की ज़रूरत और उपलब्ध सीटों के बीच का अंतर आज भी काफी बड़ा है।
बाहर जाते पैसे का असर
चूंकि देश के अंदर क्षमता अभी भी कम है, बड़ी संख्या में छात्र – जिनका अनुमान सालाना 25,000 लगाया गया है – मेडिकल की पढ़ाई के लिए विदेश जाना पसंद करते हैं। इसके चलते हर साल करीब ₹7,500 करोड़ की भारी रकम देश से बाहर जा रही है। यह ट्रेंड तब भी जारी है जब भारत में मेडिकल प्रोफेशनल्स (Medical Professionals) के लिए कमाई की अच्छी संभावनाएं हैं, जहाँ डॉक्टर औसतन हर दिन करीब ₹7,000 कमाते हैं।
मेडिकल टूरिज्म का आर्थिक विरोधाभास
एक तरफ जहां भारत में ट्रेन प्रोफेशनल्स की घरेलू कमी है, वहीं दूसरी तरफ यह एक मजबूत मेडिकल टूरिज्म इंडस्ट्री (Medical Tourism Industry) भी चलाता है, जो सालाना करीब 5 लाख मरीज़ों को आकर्षित करती है। हालांकि इससे अच्छी कमाई होती है, पर यह डॉक्टरों की अंदरूनी कमी को दूर नहीं करता। इसके अलावा, मौजूदा नियम विदेशी डॉक्टरों के व्यावसायिक आयात (Commercial Importation) पर रोक लगाते हैं, जिसका मतलब है कि देश को भविष्य की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से अपनी ट्रेनिंग क्षमता पर ही निर्भर रहना होगा।
सेक्टर का भविष्य
निवेशक (Investors) और पॉलिसीमेकर (Policymakers) देख रहे हैं कि पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (Public-Private Partnerships) या शिक्षा में प्राइवेट इन्वेस्टमेंट (Private Investment) के ज़रिए इस सप्लाई की कमी को कैसे पूरा किया जा सकता है। आने वाले समय में नए कॉलेजों को मंजूरी मिलने और उनके निर्माण की रफ़्तार, साथ ही मेडिकल ट्रेनिंग की फाइनेंसिंग (Financing) को लेकर सरकारी नीतियों में कोई भी बदलाव, इस सेक्टर के लिए मुख्य निगरानी बिंदु (Monitorable) बने रहेंगे। जैसे-जैसे क्वालिटी हेल्थकेयर (Quality Healthcare) की मांग बढ़ेगी, स्थापित मेडिकल संस्थानों के लिए फाइनेंशियल रिटर्न (Financial Returns) और नए खिलाड़ियों के लिए एंट्री की लागत (Cost of Entry) आने वाले सालों में विश्लेषण के मुख्य बिंदु बने रहेंगे।
