बाजार के दिग्गज मान रहे हैं कि भारतीय शेयर बाज़ार अब भू-राजनीतिक चिंताओं को पीछे छोड़ चुका है और कॉर्पोरेट नतीजों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। गौराव दिडवानिया का मानना है कि त्योहारी सीजन की मांग और पिछले साल की तुलना में आसान बेस के चलते सितंबर तिमाही (Q3) में कंपनी के नतीजे बेहतर रहने की उम्मीद है।
भू-राजनीति की चिंताओं से आगे
बाजार के जानकारों का मानना है कि भारतीय शेयर बाज़ार अब भू-राजनीतिक जोखिमों को काफी हद तक झेल चुका है और अब असली फोकस कंपनियों के फंडामेंटल्स पर आ गया है। Qode Advisors के पार्टनर और फंड मैनेजर, गौराव दिडवानिया (Gaurav Didwania) कहते हैं कि बाज़ार ने 'भू-राजनीतिक टैक्स' चुका दिया है, यानी इन बाहरी जोखिमों का असर मौजूदा कीमतों में पहले ही दिख रहा है। अब निवेशकों की नज़र कंपनियों के नतीजों पर टिकी है, जहाँ किसी भी कमजोरी को पहले से ज़्यादा गंभीरता से लिया जा सकता है।
सितंबर तिमाही (Q3) के नतीजों का नज़रिया
आने वाली सितंबर तिमाही में पिछले कुछ समय की तुलना में बेहतर नतीजों की उम्मीद है। इसके दो मुख्य कारण हैं: एक, पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में बेस अच्छा होना और दूसरा, त्योहारी सीजन का आना, जो आमतौर पर खपत को बढ़ाता है। इस तिमाही में 'वॉल्यूम ग्रोथ' यानी बिक्री की मात्रा में बढ़ोतरी एक अहम थीम रहेगी। कंपनियाँ जो केवल दाम बढ़ाकर नहीं, बल्कि असल में ज़्यादा माल बेचकर अपनी कमाई बढ़ाएंगी, उन्हें बाज़ार में ज़्यादा तवज्जो मिलने की संभावना है।
अहम सेक्टर्स और रुझान
कंज्यूमर डिस्पोजेबल खर्च (Consumer Discretionary Spending) में 'प्रीमियमाइजेशन' (Premiumization) यानी हाई-एंड प्रोडक्ट्स की ओर रुझान बढ़ रहा है। कंपनियाँ ऐसे प्रीमियम उत्पाद बना रही हैं जो ज़्यादा आय वाले ग्राहकों को आकर्षित करते हैं और जिनमें मास मार्केट की तुलना में तेज़ी से ग्रोथ देखी जा रही है। हालांकि, इस ट्रेंड के चलते इन कंपनियों के वैल्यूएशन (Valuation) भी ऊँचे हो सकते हैं, इसलिए निवेशकों को जोखिम प्रबंधन के लिए एंट्री पर सावधानी बरतनी होगी।
इलेक्ट्रिकल्स स्पेस (Electricals Space) में B2B इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए आउटलुक सकारात्मक बना हुआ है। केबल्स और वायर्स सेगमेंट में रेवेन्यू ग्रोथ डेटा सेंटर्स और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स जैसी स्ट्रक्चरल डिमांड से आ रही है। वहीं, पंखे और कूलर जैसे कंज्यूमर-फेसिंग इलेक्ट्रिकल प्रोडक्ट्स को लेकर सेंटीमेंट ज़्यादा सलेक्टिव है।
टेलीकॉम सेक्टर ऑपरेटिंग लिवरेज (Operating Leverage) के सिद्धांत पर काम कर रहा है। इसका मतलब है कि जैसे-जैसे रेवेन्यू बढ़ता है, वैसे-वैसे ग्राहकों को सेवा देने की लागत उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती, जिससे मुनाफे का बड़ा हिस्सा सीधा प्रॉफिट में जाता है। बड़े प्लेयर्स द्वारा कैपिटल स्पेंडिंग (Capital Spending) को सीमित करने से, भविष्य में टैरिफ हाइक (Tariff Hike) से मुनाफे और कैश फ्लो में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हो सकती है।
जोखिम और निगरानी
जहां ग्रोथ वाले क्षेत्रों पर नज़र है, वहीं निवेशकों को संभावित जोखिमों से भी सावधान रहना चाहिए। एक बड़ा बाहरी जोखिम कच्चे तेल की कीमतें हैं। अगर ग्लोबल कीमतें $95 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तो यह महंगाई की चिंताओं को फिर से बढ़ा सकती है और करंट अकाउंट पर दबाव डाल सकती है, जिसका कंपनियों के मार्जिन पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
इसके अलावा, बाज़ार का मौजूदा फोकस नतीजों पर है, इसलिए कंपनियों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने वादों को पूरा करेंगी। इस माहौल में नतीजों में निराशा पर नरमी की उम्मीद कम है। नई उम्र की कंपनियों (New-age Companies) के लिए, निवेश का नजरिया अभी भी सलेक्टिव रहेगा, जिसमें उन कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी जिनका कैश जनरेट करने और प्रॉफिटेबिलिटी सुधारने का स्पष्ट रास्ता है, बजाय उनके जो अभी भी भारी सब्सिडी के सहारे चल रही हैं।
