भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और माइनिंग सेक्टर में लंबे समय बाद रौनक लौटी है। H1FY27 में गुड्स की कीमतों में **10%** का इजाफा दर्ज किया गया है, जो पिछले **3** सालों की सुस्ती को खत्म करता है।
मार्जिन रिकवरी की उम्मीद
लंबे समय से ठहर गई कीमतों के बाद अब मैन्युफैक्चरिंग और माइनिंग सेक्टर में राहत की खबर है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की पहली छमाही (H1) में आउटपुट प्राइसेज में 10% की बढ़त देखी गई है। तुलना के लिए देखें तो FY26 की इसी अवधि में कीमतों में लगभग 0% बदलाव था, जबकि FY24 में 1% की गिरावट आई थी। यह 10% का उछाल संकेत देता है कि कंपनियां अब लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने की स्थिति में हैं, जिससे उनके प्रॉफिट मार्जिन सुधर सकते हैं।
क्या यह तेजी टिकेगी?
निवेशकों को यहां थोड़ा संभलकर रहने की जरूरत है। इस उछाल का एक बड़ा हिस्सा 'लो बेस इफेक्ट' (Low Base Effect) के कारण है, क्योंकि पिछले साल के आंकड़े काफी कमजोर थे। अब सारा दारोमदार इस पर है कि क्या रॉ मटीरियल की कीमतें स्थिर रहती हैं और कंज्यूमर डिमांड बनी रहती है या नहीं। अगर कंपनियां बहुत ज्यादा आक्रामक होकर कीमतें बढ़ाती हैं, तो डिमांड में कमी आ सकती है, जो वॉल्यूम ग्रोथ के लिए खतरा बन सकता है।
बिजली क्षेत्र अभी भी सुस्त
इस रिकवरी से बिजली क्षेत्र (Electricity Sector) अछूता है। यह सेक्टर अभी भी कमजोरी का शिकार है क्योंकि यहां रेगुलेटरी कैप्स और स्ट्रक्चरल दिक्कतें बरकरार हैं। बिजली का प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स 2022-23 के बेस ईयर के मुकाबले अभी भी 8.4% नीचे चल रहा है।
आने वाली तिमाहियों में निवेशकों के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इनपुट कॉस्ट और आउटपुट प्राइसेज के बीच का गैप कैसा रहता है। साथ ही, अगर यह महंगाई बढ़ती है, तो RBI अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को सख्त कर सकता है, जिसका असर पूरे बाजार पर दिखेगा।
