महाराष्ट्र सरकार CSR फंड को सेंट्रलाइज करने के लिए एक नई अथॉरिटी बनाने की तैयारी में है। इस 'प्रोजेक्ट बैंक' के प्रस्ताव ने कॉर्पोरेट जगत में चिंता बढ़ा दी है कि क्या अब कंपनियों के सामाजिक खर्च पर सरकार का दबाव बढ़ेगा?
महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी CSR फंड्स को मैनेज करने के लिए 'Maha CSR Authority' का प्रस्ताव पेश किया है। इस अथॉरिटी की अध्यक्षता खुद मुख्यमंत्री करेंगे और इसमें सीनियर सरकारी अधिकारियों के साथ इंडस्ट्री के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। इसका मुख्य आधार एक 'प्रोजेक्ट बैंक' होगा, जिसमें सरकार की प्राथमिकता वाली योजनाएं शामिल होंगी। सरकार का कहना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और प्रोजेक्ट्स की मॉनिटरिंग बेहतर होगी।\n\n### कॉर्पोरेट ऑटोनॉमी पर सवाल\n\nभारतीय नियमों के तहत, विशेष रूप से Companies Act की धारा 135 के तहत, कंपनियों के बोर्ड को यह तय करने की पूरी आजादी है कि वे अपना CSR फंड कहां खर्च करेंगी। आलोचकों का मानना है कि इस नई व्यवस्था से यह आजादी छिन सकती है। भले ही इसे एक फैसिलिटेटर के तौर पर पेश किया जाए, लेकिन डर इस बात का है कि यह प्राइवेट कैपिटल को सरकारी एजेंडे के मुताबिक चलाने का जरिया बन सकता है।\n\n### कंपनियों के लिए क्या हैं रिस्क?\n\nनिवेशकों और कॉर्पोरेट लीडर्स के लिए सबसे बड़ी चिंता 'इम्प्लिसिट कोर्शन' यानी अप्रत्यक्ष दबाव की है। जो कंपनियां अक्सर सरकारी मंजूरी और कामकाज के लिए राज्य प्रशासन पर निर्भर रहती हैं, उन्हें अथॉरिटी द्वारा सुझाए गए प्रोजेक्ट्स में फंड देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे छोटे NGO को मिलने वाला फंड भी प्रभावित हो सकता है।\n\n### आर्थिक पक्ष और नजरें\n\nमहाराष्ट्र में सालाना CSR स्पेंडिंग का आंकड़ा लगभग ₹8,700 करोड़ है। हालांकि, राज्य के बजट के मुकाबले यह राशि छोटी है, लेकिन इसके सेंट्रलाइजेशन का असर बड़ा हो सकता है। फिलहाल यह प्रस्ताव ड्राफ्टिंग स्टेज में है और किसी भी लिस्टेड कंपनी ने इस पर कोई आधिकारिक फाइलिंग नहीं की है। निवेशकों को अब इस पर नजर रखनी चाहिए कि क्या यह प्रोजेक्ट बैंक वास्तव में स्वैच्छिक (voluntary) रहेगा या सरकारी कामकाज के लिए एक अनकही शर्त बन जाएगा।
