2026 में भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते ट्रेड तनाव को देखते हुए 1998 का दौर चर्चा में है। उस समय के प्रतिबंधों के मुकाबले आज भारत की अर्थव्यवस्था ज्यादा मजबूत और आत्मनिर्भर है, लेकिन निवेशकों के लिए जोखिम के नए समीकरण बन रहे हैं।
साल 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, जिससे विदेशी सहायता और वैश्विक संस्थानों से मिलने वाली फंडिंग रुक गई थी। उस वक्त जीडीपी ग्रोथ 5.8% थी, जो 2003 तक बढ़कर 7.8% तक पहुंच गई। यह साबित करता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों को सोखने की क्षमता रखती है।
आज की स्थिति क्यों है अलग?
1998 में अमेरिका के साथ हमारे व्यापारिक संबंध सीमित थे, लेकिन 2026 तक अमेरिका भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बन चुका है। इसका मतलब है कि आज का जोखिम आइसोलेशन का नहीं, बल्कि टैरिफ का है। IT सर्विसेज, फार्मा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर, जो अपनी कमाई के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं, इस वक्त ज्यादा संवेदनशील हैं।
घरेलू बाजार का सुरक्षा कवच
आज भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा है और एक विशाल घरेलू उपभोक्ता बाजार मौजूद है। अगर टैरिफ के कारण एक्सपोर्ट मांग में कमी आती है, तो भारतीय बाजार पर केंद्रित कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करने की स्थिति में हैं।
निवेशकों के लिए राय
पोर्टफोलियो बनाते समय निवेशकों को उन कंपनियों पर ध्यान देना चाहिए जो घरेलू मांग (जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर, बैंकिंग और मैन्युफैक्चरिंग) से प्रेरित हैं। एक्सपोर्ट-निर्भर कंपनियों के मार्जिन पर दबाव आ सकता है। 1998 का इतिहास सिखाता है कि नए ट्रेड पार्टनर्स की तलाश और घरेलू मजबूती ही ऐसे तनावपूर्ण समय में अर्थव्यवस्था को बचाए रखने का एकमात्र रास्ता है।
