शेयर बाजार में SEBI इनसाइडर ट्रेडिंग पर सख्त है, लेकिन रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अभी कोई ठोस नियम नहीं हैं। सरकारी जानकारी का फायदा उठाकर की जाने वाली लैंड डील्स से प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ रही है।
नियम और कानून का बड़ा अंतर
शेयर बाजार में SEBI के कड़े नियमों के कारण कोई भी व्यक्ति अंदरूनी जानकारी का फायदा उठाकर शेयर नहीं खरीद सकता। लेकिन रियल एस्टेट सेक्टर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इसका सीधा असर सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर पड़ता है।
सट्टेबाजी का खेल और सरकारी प्रोजेक्ट्स
परांंदूर एयरपोर्ट जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के शुरुआती चरणों में साइट की जानकारी गोपनीय रखी जाती है। कुछ लोग इस जानकारी का फायदा उठाकर उन इलाकों में जमीन खरीद लेते हैं, जहां भविष्य में एयरपोर्ट या हाईवे बनना है। जब प्रोजेक्ट का आधिकारिक ऐलान होता है, तब जमीन की कीमतें अनेक गुना बढ़ जाती हैं। इससे न केवल सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ता है, बल्कि प्रोजेक्ट्स में देरी भी होती है।
प्रोजेक्ट्स की लागत और रुकावटें
MoSPI की रिपोर्टों के अनुसार, जमीन का अधिग्रहण (Land Acquisition) भारत में इंफ्रा प्रोजेक्ट्स के पीछे देरी का एक मुख्य कारण है। सट्टेबाजी के कारण जमीन महंगी होने से विवाद पैदा होते हैं, जो अदालती मुकदमों और विरोध प्रदर्शनों में बदल जाते हैं।
समाधान क्या हो सकते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि RERA 2016 जैसे कानूनों के बावजूद, प्लानिंग फेज में पारदर्शिता की कमी है। इसके लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं:
- 'क्वाइट पीरियड' (Quiet Period): प्रोजेक्ट प्लानिंग से जुड़े अधिकारियों और उनके रिश्तेदारों के लिए जमीन खरीद पर रोक।
- डिजिटल ट्रैकिंग: PAN को लैंड पार्सल से जोड़ना ताकि संदिग्ध ट्रांजैक्शन पकड़े जा सकें।
- कानूनी बदलाव: 'प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट' में संशोधन ताकि गोपनीय डेटा के दुरुपयोग को अपराध माना जाए।
