1976 के Bonded Labour Act के पालन में लगातार हो रही देरी और निष्क्रिय निगरानी समितियां भारतीय कंपनियों के लिए बड़ा ESG रिस्क पैदा कर रही हैं। लेबर-इंटेंसिव सेक्टर में काम करने वाली फर्मों के सप्लाई चेन अब सीधे तौर पर निशाने पर हैं।
1976 में 'Bonded Labour System (Abolition) Act' लागू होने के 50 साल बाद भी भारत में लेबर कानूनों का क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। हाल ही में आंध्र प्रदेश में 98 प्रवासी मजदूरों को चारकोल यूनिट से मुक्त कराया गया, जिसने प्रशासनिक निगरानी में मौजूद बड़ी खामियों को उजागर कर दिया है। यह सिर्फ एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि अब बिजनेस के 'Environment, Social, and Governance' (ESG) अनुपालन (Compliance) का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है।
समस्या की जड़ डिस्ट्रिक्ट और सब-डिविजनल विजिलेंस कमेटियों का फेलियर है। इन कमेटियों को लेबर नियमों के उल्लंघन पर नजर रखनी थी, लेकिन कई क्षेत्रों में ये पूरी तरह निष्क्रिय हैं। National Human Rights Commission (NHRC) भी कई बार कह चुका है कि सिस्टम के सक्रिय न होने से सरकार सिर्फ घटना होने के बाद 'रिएक्ट' करती है, न कि उसे रोकने के लिए कोई 'प्रिवेंटिव' कदम उठाती है।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
टेक्सटाइल, एग्रीकल्चर, कंस्ट्रक्शन और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर, जो लेबर पर बहुत अधिक निर्भर हैं, अब ग्लोबल इन्वेस्टर्स की नजर में हैं। अगर स्थानीय प्रशासन लेबर एक्सप्लॉयटेशन को रोकने में विफल रहता है, तो इसकी सीधी जिम्मेदारी कंपनियों पर आती है। इससे कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ सकती है क्योंकि उन्हें अब कड़े इंटरनल ऑडिट और थर्ड-पार्टी मॉनिटरिंग पर खर्च करना होगा।
कंपनियों की साख (Reputation) पर आंच आने का मतलब है कि वे अंतरराष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट खो सकती हैं और उन्हें 'सोशली कॉन्शियस' कैपिटल जुटाने में भी दिक्कत होगी। फिलहाल, रिहैबिलिटेशन फंड्स का भी सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, क्योंकि पीड़ितों की पहचान ही कम हो रही है। आने वाले समय में, सप्लाई चेन में पारदर्शिता की कमी और प्रशासनिक ढिलाई के कारण कंपनियों के काम-काज में अचानक बाधा आ सकती है। निवेशकों को मैनेजमेंट की उन कॉमेंट्री पर नजर रखनी चाहिए, जो लेबर ऑडिट और एथिकल प्रोक्योरमेंट के प्रति उनकी गंभीरता को दर्शाती हैं।
