क्विक कॉमर्स के बढ़ते दबदबे को टक्कर देने के लिए अब देश भर के किराना स्टोर एकजुट हो रहे हैं। ये दुकानदार 'को-ऑपरेटिव क्लस्टर मॉडल' अपनाकर अपनी लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी को तेज करने की तैयारी में हैं, जिसे नेशनल को-ऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (अमेंडमेंट) बिल, 2026 से बड़ा सहारा मिल सकता है।
'को-ऑपेटीशन' का नया दांव
तेजी से उभरते क्विक कॉमर्स सेक्टर के कारण भारत का अनऑर्गेनाइज्ड रिटेल सेक्टर एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अब छोटे किराना दुकानदार 'को-ऑपेटीशन' (Coopetition) मॉडल के जरिए एक नई रणनीति अपना रहे हैं। इसके तहत 20 किराना स्टोर एक 3-किलोमीटर के दायरे में आकर एक क्लस्टर बनाएंगे। इस सिस्टम में वे अपने डिलीवरी स्टाफ, वाहन और तकनीकी संसाधनों को साझा करेंगे, ताकि ग्राहकों तक 20 मिनट के भीतर सामान पहुंचाया जा सके।
स्थानीय निकायों का कड़ा रुख
इस लड़ाई में स्थानीय प्रशासन भी छोटे दुकानदारों के साथ खड़ा दिख रहा है। उदाहरण के तौर पर, खासी हिल्स ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल ने हाल ही में एक बड़ी क्विक कॉमर्स कंपनी को ट्रेडिंग लाइसेंस देने से इनकार कर दिया था, जो दर्शाता है कि पारंपरिक रिटेल और क्विक कॉमर्स के बीच टकराव बढ़ रहा है।
तकनीकी चुनौतियां और भविष्य
हालांकि, यह मॉडल इतना आसान नहीं है। इन्वेंट्री मैनेजमेंट और ऑर्डर रूटिंग जैसे कामों के लिए सभी दुकानों को एक कॉमन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाना सबसे बड़ी चुनौती है। साथ ही, अलग-अलग मालिकों के बीच राजस्व (Revenue) और ऑर्डर का सही बंटवारा करने के लिए सख्त नियमों की जरूरत होगी।
सरकार से उम्मीदें
सरकारी स्तर पर पेश होने वाला 'नेशनल को-ऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (अमेंडमेंट) बिल, 2026' इस पूरे सेक्टर के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यह बिल न केवल तकनीकी अपग्रेडेशन के लिए फंडिंग का रास्ता खोलेगा, बल्कि किराना स्टोर्स को बड़े प्लेटफॉर्म्स से मुकाबले के लिए जरूरी 'स्केल' भी प्रदान करेगा। अंत में, किराना स्टोर की सबसे बड़ी ताकत उनका 'ह्यूमन कनेक्शन' है, जिसे तकनीक के साथ जोड़कर वे इस बाजार में अपनी धाक जमाए रख सकते हैं।
