केरल में मॉनसून सीज़न उम्मीद से काफी सूखा साबित हो रहा है। 24 अगस्त 2026 तक राज्य में सामान्य से 23% कम बारिश दर्ज की गई है। मौसम विभाग ने इसे 'कमी' वाला मॉनसून करार दिया है, जिसका असर आने वाले महीनों में खेती, ग्रामीण आय और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है।
केरल का सूखा मॉनसून: आंकड़े क्या कहते हैं?
1 जून से 24 अगस्त 2026 के बीच, केरल में सामान्य रूप से 1,671.4 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन असल में सिर्फ 1,278.7 मिमी बारिश हुई है। यह सामान्य से 23% कम है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने इसे आधिकारिक तौर पर 'कमी' वाला मॉनसून घोषित किया है, जो लंबे समय के औसत से एक बड़ा अंतर दिखाता है।
खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
यह बारिश की कमी राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, जो भारत के बागान उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देती है। केरल चाय, कॉफी, रबर, इलायची और काली मिर्च का एक प्रमुख उत्पादक है। मॉनसून की बारिश में लगातार कमी से फसल की पैदावार और गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है। इसका सीधा असर बागान और कृषि-आधारित कंपनियों के मुनाफे पर पड़ने की आशंका है।
खेती से होने वाली आय ग्रामीण केरल की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। अगर फसलें अच्छी नहीं हुईं, तो लोगों की खर्च करने की क्षमता कम हो जाएगी, जिससे ग्रामीण इलाकों में मांग में कमी आ सकती है। फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) और दोपहिया वाहन बनाने वाली कंपनियां, जो ग्रामीण खर्च पर नजर रखती हैं, उन्हें इस स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
बिजली उत्पादन और क्षेत्रीय जोखिम
पानी का प्रबंधन भी एक बड़ी चिंता का विषय है। राज्य के वायनाड में 51% और इडुक्की में 45% की सबसे ज़्यादा बारिश की कमी दर्ज की गई है। इडुक्की में एक महत्वपूर्ण जलाशय प्रणाली है, जो राज्य के बिजली उत्पादन का मुख्य स्रोत है। पानी का स्तर कम होने से पनबिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में, राज्य को महंगी बिजली खरीदनी पड़ सकती है या ऊर्जा आपूर्ति की समस्या का सामना करना पड़ सकता है। अगर यह स्थिति बनी रही, तो यह क्षेत्र के बिजली-गहन उद्योगों की परिचालन लागत को भी बढ़ा सकती है।
निवेशकों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
हालांकि कन्नूर, कासरगोड, कोट्टयम, कोझिकोड, पथनमथिट्टा और तिरुवनंतपुरम जैसे छह जिलों में बारिश सामान्य स्तर पर है, लेकिन राज्य के अधिकांश हिस्सों में यह कमी एक बड़े जलवायु जोखिम की ओर इशारा करती है।
निवेशकों को राज्य की कृषि रिपोर्टों पर नज़र रखनी चाहिए, ताकि फसल उत्पादन पर वास्तविक प्रभाव का पता चल सके। इसके अलावा, सितंबर में IMD द्वारा मॉनसून की रिकवरी पर अपडेट और राज्य सरकार से जलाशय के साप्ताहिक जल स्तर की रिपोर्टें यह समझने में महत्वपूर्ण होंगी कि पानी का यह संकट मॉनसून के बाद भी बना रहेगा या इसमें सुधार होगा।
