India-Oman trade pact लागू होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर के निर्यातक बड़ी मुश्किलों में हैं। सेंट्रलाइज्ड सर्टिफिकेशन और ज्यादा फ्रेट कॉस्ट के चलते छोटे उत्पादकों को ड्यूटी-फ्री एक्सेस का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
भारत और ओमान के बीच 1 जून, 2026 से लागू हुआ 'Comprehensive Economic Partnership Agreement' (CEPA) वैसे तो भारतीय निर्यातकों के लिए गल्फ मार्केट के दरवाजे खोलता है, लेकिन कश्मीर के छोटे व्यापारियों के लिए यह समझौता अब भी दूर की कौड़ी साबित हो रहा है।
सर्टिफिकेशन की चुनौती
इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ है 'Certificate of Origin' के लिए जटिल नियम। फिलहाल, कश्मीर के निर्यातकों को अपना कागजी काम लुधियाना स्थित Directorate General of Foreign Trade (DGFT) की रीजनल अथॉरिटी के जरिए पूरा करना पड़ता है। यह भौगोलिक दूरी छोटे कारीगरों और कृषि उत्पादकों के लिए समय और पैसे की बर्बादी है, जिससे उनका प्रॉफिट मार्जिन पूरी तरह खत्म हो जाता है।
लॉजिस्टिक्स की मार
दस्तावेजों के अलावा, कश्मीर के सामने बड़ी लॉजिस्टिकल बाधाएं भी हैं। शिपिंग पोर्ट्स से सीधी कनेक्टिविटी न होने के कारण फ्रेट कॉस्ट बहुत ज्यादा है। नतीजतन, ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलने के बावजूद प्रोडक्ट की लागत इतनी बढ़ जाती है कि वह इंटरनेशनल मार्केट में प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाता।
₹300 करोड़ का व्यापार फंसा
भले ही यह समझौता 98% से अधिक टैरिफ लाइन्स पर ड्यूटी-फ्री एक्सेस देने का दावा करता है, लेकिन कश्मीर में इसका असर नगण्य है। वर्तमान में यहाँ का रीजनल ट्रेड वॉल्यूम लगभग ₹300 करोड़ का है, जो कि सही सुविधाएं मिलने पर कहीं ज्यादा हो सकता है।
अब आगे क्या?
इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक स्थानीय स्तर पर 'एक्सपोर्ट फैसिलिटेशन सेल' नहीं बनाए जाते और सर्टिफिकेशन प्रोसेस को विकेंद्रीकृत (decentralize) नहीं किया जाता, तब तक कश्मीरी व्यापारियों के लिए इस ट्रेड डील का फायदा उठाना नामुमकिन रहेगा।
