कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने 'Namma Shaale Namma Javabdari' पहल लॉन्च की है। CSR फंड के जरिए ग्रामीण स्कूलों की सूरत बदलने के लिए **₹206.10 करोड़** का निवेश जुटाया गया है, लेकिन प्राइवेट स्कूलों के विरोध ने चिंताएं बढ़ा दी हैं।
कर्नाटक सरकार ने सरकारी स्कूलों को नई पहचान देने के लिए 'Namma Shaale Namma Javabdari' (हमारा स्कूल, हमारी जिम्मेदारी) पहल की शुरुआत की है। इस मिशन का लक्ष्य प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा सुधारना है। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के मुताबिक, शुरुआती दौर में 1,000 स्कूलों को कवर किया जाएगा, जिसे भविष्य में बढ़ाकर 2,000 तक ले जाने का रोडमैप तैयार है।
निवेश का गणित
हाल ही में 'विधान सौधा' में आयोजित एक समिट में 15 संगठनों ने 56 स्कूलों के विकास के लिए ₹206.10 करोड़ के निवेश का वादा किया है। इस नई प्रतिबद्धता को मिलाकर, कुल निवेश अब ₹355.10 करोड़ तक पहुंच गया है, जिससे राज्य के 112 स्कूलों का कायाकल्प होगा। सरकार का मानना है कि ग्रामीण शिक्षा स्तर सुधरने से शहरों की ओर हो रहे पलायन पर लगाम लगेगी।
CSR फंड का बेहतर इस्तेमाल
राज्य में सालाना लगभग ₹8,800 करोड़ का CSR फंड उपलब्ध है, जिसका बड़ा हिस्सा अक्सर दूसरे राज्यों के कॉर्पोरेट हेडक्वार्टर्स में चला जाता है। सरकार अब एक सीधा एंगेजमेंट मॉडल अपना रही है ताकि यह पैसा स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर में लगे। कंपनियों को केवल कैश नहीं, बल्कि लैब उपकरण, कंप्यूटर और स्कूल बस जैसी सुविधाएं देने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
क्या है विवाद की जड़?
इस योजना का प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन खुलकर विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि सरकारी अपेक्षाओं के दबाव में कहीं उनके ऊपर वित्तीय बोझ न बढ़ जाए, जिसका खामियाजा छात्रों को फीस वृद्धि के रूप में भुगतना पड़ सकता है। अब निवेशकों की नजर इस पर है कि सरकार और प्राइवेट सेक्टर के बीच तालमेल कैसे बैठता है और यह मॉडल बिना किसी बिजनेस अस्थिरता के धरातल पर कैसे उतरता है।
