कर्नाटक में गिग वर्कर्स के लिए बने 2025 एक्ट के तहत अब यूनियनें तुरंत लाभ बांटने की मांग कर रही हैं। हालांकि, बड़ी कंपनियां इसे कोर्ट में चुनौती दे चुकी हैं, जिससे सारा पैसा सरकारी फंड के बजाय कोर्ट रजिस्ट्री में जमा हो रहा है।
कर्नाटक में गिग वर्कर्स के लिए बने कानून को लेकर खींचतान तेज हो गई है। 'कर्नाटक प्लेटफॉर्म-बेस्ड गिग वर्कर्स (सोशल सिक्योरिटी एंड वेलफेयर) एक्ट, 2025' के तहत डिलीवरी और ट्रांसपोर्ट प्लेटफॉर्म्स को अपनी कमाई का कम से कम 1% वेलफेयर फंड में जमा करना अनिवार्य है। यूनियनें चाहती हैं कि अब सरकार सिर्फ पैसा वसूलने के बजाय करीब 7 लाख गिग वर्कर्स को हेल्थ इंश्योरेंस, मैटरनिटी बेनिफिट्स और एक्सीडेंट कवर का लाभ तुरंत देना शुरू करे।
कानूनी लड़ाई का पेंच
इस मांग के बीच एक बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। Zomato, Swiggy, Zepto और Uber जैसी दिग्गज कंपनियों ने इस एक्ट को कर्नाटक हाई कोर्ट में चुनौती दी है। कंपनियों का तर्क है कि राज्य का यह कानून केंद्र के 'कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020' के खिलाफ है। इसे कानूनी भाषा में 'डॉक्ट्रिन ऑफ रिपगनेंसी' कहा जाता है। कंपनियों का कहना है कि केंद्र के नियमों के ऊपर राज्य का अतिरिक्त टैक्स उन पर दोहरा बोझ डाल रहा है।
पैसा कहां फंसा है?
हाई कोर्ट ने अभी इस कानून पर कोई रोक (Stay) नहीं लगाई है, लेकिन कंपनियों को राहत देते हुए कहा है कि वे 1% वेलफेयर फीस सरकारी फंड के बजाय सीधे 'कोर्ट रजिस्ट्री' में जमा करें। इसका मतलब है कि पैसा सुरक्षित तो है, लेकिन सरकार इसे लाभार्थियों तक नहीं पहुंचा पा रही है।
निवेशकों के लिए क्या संकेत हैं?
निवेशकों के लिए फिलहाल अनिश्चितता का माहौल है। कंपनियां कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए पैसा जमा कर रही हैं, लेकिन यह उनकी भविष्य की लायबिलिटी (Liability) तय नहीं है। यदि हाई कोर्ट राज्य सरकार के पक्ष में फैसला देता है, तो कंपनियों को भविष्य में भी यह पेमेंट मॉडल जारी रखना होगा। वहीं, अगर नियम बदलता है या कानून रद्द होता है, तो कंपनियों के ऑपरेशनल खर्च में राहत मिल सकती है या जमा किए गए पैसे वापस मिल सकते हैं। ध्यान रहे, 1 मई 2026 से राज्य सरकार ने ग्रिवांस रिड्रेसल मैकेनिज्म भी शुरू कर दिया है, जिससे साफ है कि कानूनी लड़ाई के बावजूद रेगुलेटरी बदलाव जमीन पर उतर रहे हैं।
