आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दौड़ में बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों ने कर्ज का जाल बिछा दिया है। साल 2026 में अब तक कंपनियां **$223 बिलियन** के बॉन्ड जारी कर चुकी हैं, जो पिछले साल के मुकाबले दोगुना से भी ज्यादा है। Jefferies ने चेतावनी दी है कि यह भारी-भरकम कर्ज न सिर्फ महंगाई को हवा दे रहा है, बल्कि अमेरिकी सरकार के साथ कैपिटल के लिए सीधे मुकाबले में है।
दुनिया भर की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियां AI के शोर के बीच कर्ज लेने की एक अंधी दौड़ में शामिल हो गई हैं। Jefferies के स्ट्रैटेजिस्ट क्रिस्टोफर वुड के अनुसार, इन 'हाइपरस्केलर्स' ने साल 2026 के पहले आठ महीनों में ही $223 बिलियन जुटा लिए हैं, जबकि पूरे साल 2025 में यह आंकड़ा सिर्फ $108 बिलियन था।
क्यों चिंता का विषय है यह कर्ज?
कंपनियां इस पैसे का इस्तेमाल डेटा सेंटर्स, सेमीकंडक्टर चिप्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने में कर रही हैं। हालांकि मैनेजमेंट का तर्क है कि इससे भविष्य में प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी, लेकिन हकीकत यह है कि फिलहाल यह फिजिकल रिसोर्सेज की भारी खपत कर रहा है, जिससे महंगाई काबू में नहीं आ रही है।
सरकार के साथ सीधी टक्कर
इतनी भारी मात्रा में डेट (Debt) जारी होने से क्रेडिट मार्केट का स्वरूप बदल गया है। टेक कंपनियां अब फंड जुटाने के लिए सीधे अमेरिकी सरकार से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। इसके चलते 'क्रेडिट स्प्रेड' बढ़ गए हैं, जिसका सीधा मतलब है कि अब कंपनियों को निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकारी बॉन्ड के मुकाबले कहीं ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है।
भारतीय निवेशकों पर क्या असर होगा?
यह स्थिति भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट के लिए एक खतरे की घंटी है। अगर अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो ग्लोबल निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की तरफ रुख कर सकते हैं। इससे एफआईआई (FII) की बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है।
आने वाले समय में निवेशकों की नजर इस बात पर होगी कि क्या ये AI प्रोजेक्ट्स उतना मुनाफा कमा पाएंगे जो इस कर्ज के ब्याज का बोझ उठा सके। अगर निवेश पर रिटर्न (ROI) उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, तो टेक कंपनियों के शेयरों में बड़ी गिरावट देखने को मिल सकती है।
