Jefferies के स्ट्रैटेजिस्ट Christopher Wood ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी ट्रेजरी सरकारी कर्ज के बोझ को कम करने के लिए लॉन्ग-टर्म बॉन्ड यील्ड को नियंत्रित कर रही है। इस हस्तक्षेप से डॉलर के कमजोर होने का जोखिम है, जिसके चलते सोने और गोल्ड-माइनिंग शेयरों में निवेश बढ़ाना समझदारी हो सकती है।
ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। Jefferies के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटेजी, Christopher Wood का मानना है कि अमेरिका में अब लॉन्ग-टर्म लोन की लागत पर नियंत्रण Federal Reserve के बजाय U.S. Treasury Department के हाथ में है। ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent के नेतृत्व में, अमेरिकी सरकार अब सीधे बॉन्ड-बाइंग रणनीतियों का इस्तेमाल करके यील्ड लेवल को कंट्रोल कर रही है।
यील्ड मैनेजमेंट का क्या मतलब है?
इस रणनीति का मुख्य मकसद सरकारी बॉन्ड यील्ड को एक सीमित दायरे में रखना है ताकि सरकारी कर्ज का ब्याज भुगतान बहुत महंगा न हो जाए। सरकार बॉन्ड बायबैक और ट्रेजरी कैश अकाउंट्स का इस्तेमाल कर रही है ताकि 4.77% के स्तर पर 10-वर्षीय यील्ड को थामे रखा जा सके।
निवेशकों के लिए जोखिम और अवसर
वर्तमान में महंगाई 2% के टारगेट से ऊपर बनी हुई है और AI इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भारी पूंजी की मांग है, जो स्वाभाविक रूप से ब्याज़ दरों को ऊपर धकेल रही है। लेकिन ट्रेजरी का हस्तक्षेप इन मार्केट फोर्सेज को दबा रहा है। Christopher Wood के अनुसार, यह 'करेंसी डिबेसमेंट' (currency debasement) का चक्र शुरू कर सकता है, जिससे डॉलर की वैल्यू धीरे-धीरे घट सकती है।
इस स्थिति से बचने के लिए उन्होंने निवेशकों को कैश से हटकर गोल्ड और गोल्ड-माइनिंग शेयरों जैसे 'हार्ड एसेट्स' में शिफ्ट होने का सुझाव दिया है।
भारतीय निवेशकों पर क्या असर होगा?
भारतीय निवेशकों के लिए यह खबर महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- डॉलर कमजोर होने पर सोने की मांग और दाम बढ़ जाते हैं।
- यदि अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट के दबाव के बजाय कर्ज प्रबंधन को प्राथमिकता देती है, तो ग्लोबल लिक्विडिटी में उतार-चढ़ाव आ सकता है।
- भारत जैसे इमर्जिंग मार्केट्स में विदेशी निवेश (FII) फ्लो पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। निवेशकों को सलाह है कि वे लंबी अवधि के बॉन्ड होल्डिंग्स को लेकर सतर्क रहें।
