जयंत सिन्हा ने भारत के नेट-जीरो ट्रांजिशन को गति देने के लिए एक स्पष्ट ग्रीन टैक्सोनॉमी और सस्टेनेबिलिटी फाइनेंसिंग संस्थान की वकालत की है। यह कदम निवेशकों के लिए जोखिम कम करने और ग्रीन प्रोजेक्ट्स को आसान फंड दिलाने में मददगार होगा।
ग्रीन टैक्सोनॉमी क्यों है जरूरी?
नई दिल्ली में आयोजित 21वें CII ग्लोबल सस्टेनेबिलिटी समिट में जयंत सिन्हा ने साफ किया कि भारत को अब एक औपचारिक क्लासिफिकेशन सिस्टम की जरूरत है। ग्रीन टैक्सोनॉमी का मतलब है—एक ऐसा स्टैंडर्ड तय करना जिससे यह साफ हो सके कि कौन सी गतिविधियां वास्तव में 'सस्टेनेबल' हैं। फिलहाल, इसकी कमी के कारण फंड मैनेजर्स और बड़े निवेशकों के बीच काफी भ्रम की स्थिति रहती है। एक आधिकारिक परिभाषा तय होने से प्रोजेक्ट्स में निवेश का जोखिम कम होगा और पैसा सही दिशा में लग सकेगा।
लॉन्ग-टर्म कैपिटल की चुनौती
सिन्हा ने एक डेडिकेटेड सस्टेनेबिलिटी फाइनेंसिंग इंस्टीट्यूशन बनाने का सुझाव दिया है। मौजूदा बैंकिंग सिस्टम आमतौर पर शॉर्ट-टर्म या मीडियम-टर्म लोन के लिए बने हैं, जबकि बड़े ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लंबे समय के लिए 'पेशेंट कैपिटल' की दरकार होती है। यह नया संस्थान एक ब्रिज की तरह काम कर सकता है, जो उन प्रोजेक्ट्स को वित्तीय सहायता मुहैया कराएगा जिन्हें पारंपरिक बैंकों से फंड जुटाने में मुश्किल होती है।
क्या है आगे का रोडमैप?
यह मांग ऐसे समय में उठी है जब भारत अपना कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम लागू कर रहा है। सिन्हा के मुताबिक, इन सुधारों की सफलता के लिए SEBI, RBI और सरकारी मंत्रालयों के बीच तालमेल बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी खारिज किया कि पर्यावरण के नियम आर्थिक विकास में बाधा हैं; बल्कि ये इन्वेस्टमेंट एफिशिएंसी बढ़ाकर जॉब क्रिएशन और इकोनॉमिक स्टेबिलिटी के लिए नए अवसर पैदा करेंगे। बाजार की नजर अब इस पर है कि सरकार इन प्रस्तावों को नीतिगत ढांचे (Regulatory Policy) में कैसे शामिल करती है।
