जापान सरकार ने लेबर शॉर्टेज से निपटने और इकोनॉमिक ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए महीने में **45 घंटे** की स्वैच्छिक ओवरटाइम कैप को खत्म कर दिया है। प्रधानमंत्री Sanae Takaichi के इस कदम का मकसद उन सेक्टरों को राहत देना है जो कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं, हालांकि इसे लेकर वर्क कल्चर और हेल्थ रिस्क पर बहस भी छिड़ गई है।
जापान की लेबर पॉलिसी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सितंबर 2026 से प्रभावी होने जा रहे इस फैसले के तहत प्रधानमंत्री Sanae Takaichi की सरकार ने 45 घंटे की वॉलंटरी ओवरटाइम कैप को हटा दिया है। सालों से लेबर स्टैंडर्ड्स ऑफिस इस सीमा का इस्तेमाल वर्कप्लेस कल्चर को नियंत्रित करने के लिए कर रहे थे, लेकिन अब सरकार का पूरा ध्यान इकोनॉमिक प्रोडक्टिविटी बढ़ाने पर है।
इकोनॉमिक ड्रायवर्स और बिजनेस की हकीकत
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब जापान का कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहा है। 'Japan Chamber of Commerce and Industry' के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 20% छोटी और मध्यम कंपनियों का मानना था कि 45 घंटे की सीमा उनके कामकाज में बाधा डाल रही थी। हकीकत तो यह है कि करीब 40% जापानी कंपनियां पहले से ही कानूनी समझौतों के जरिए अपने कर्मचारियों से महीने में 100 घंटे तक ओवरटाइम करवा रही थीं। सरकार का यह कदम मौजूदा बिजनेस प्रैक्टिस को औपचारिक मान्यता देने जैसा है।
वर्क कल्चर को लेकर बढ़ी चिंता
इस फैसले का ट्रेड यूनियन्स और लेबर राइट्स एडवोकेट्स कड़ा विरोध कर रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि ओवरसाइट खत्म करने से जापान का पुराना 'एक्सट्रीम वर्क कल्चर' वापस आ सकता है। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि जो कंपनियां वर्कप्लेस स्ट्रेस को मैनेज किए बिना काम के घंटे बढ़ाएंगी, उन्हें रिप्यूटेशनल डैमेज, स्टाफ टर्नओवर या ESG रेटिंग में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, जो कंपनियां इस लचीलेपन का सही इस्तेमाल करेंगी, उनकी प्रोडक्शन कैपेसिटी और मार्जिन में सुधार की संभावना है।
