जापान में महंगाई की रफ्तार तेज हो गई है। जुलाई में कोर महंगाई दर बढ़कर **1.8%** पर पहुंच गई है, जिसका मुख्य कारण आयात लागत का बढ़ना और येन का कमजोर होना है। इस आंकड़ों के बाद उम्मीदें बढ़ गई हैं कि बैंक ऑफ जापान (BOJ) अपनी सितंबर की पॉलिसी मीटिंग में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। इन आंकड़ों के आते ही जापानी शेयर बाज़ारों में गिरावट दर्ज की गई।
महंगाई की बढ़ी रफ्तार
जापान के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, जुलाई 2026 में कोर महंगाई दर (जिसमें ताज़े खाद्य पदार्थों को शामिल नहीं किया जाता) 1.8% रही। यह जून के 1.6% के आंकड़े से ज़्यादा है। हालांकि, यह बैंक ऑफ जापान के 2% के लक्ष्य से थोड़ा कम है, लेकिन यह साफ संकेत है कि कीमतों पर दबाव बढ़ रहा है। इस बढ़ोतरी की वजह मुख्य रूप से आयातित सामानों के महंगे होने और कमजोर येन को माना जा रहा है, जिससे जापानी कंपनियों और ग्राहकों के लिए विदेशी सामान ज़्यादा महंगे हो गए हैं।
अर्थव्यवस्था में बढ़ता महंगाई का दबाव
अगर हम ताज़े खाद्य पदार्थों और एनर्जी को छोड़कर महंगाई के और सटीक आंकड़े देखें, तो जुलाई में यह दर बढ़कर 1.9% हो गई, जो जून में 1.7% थी। इससे पता चलता है कि महंगाई का असर अब अर्थव्यवस्था के ज़्यादातर हिस्सों में फैल रहा है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि कंपनियाँ लागत बढ़ने, जैसे कि टाइट लेबर मार्केट के कारण बढ़े वेतन, का बोझ सीधे ग्राहकों पर डाल रही हैं, खासकर सर्विस सेक्टर में कीमतें बढ़ाई जा रही हैं।
बैंक ऑफ जापान की पॉलिसी पर असर
ये आंकड़े बैंक ऑफ जापान (BOJ) के लिए 17-18 सितंबर, 2026 को होने वाली पॉलिसी मीटिंग में चर्चा का मुख्य विषय होंगे। जून में ब्याज दरों को 1% तक बढ़ाने के बाद, केंद्रीय बैंक थोड़ी सावधानी बरत रहा था। लेकिन, महंगाई के बढ़ते आंकड़ों को देखते हुए बाज़ार में यह उम्मीद तेज़ हो गई है कि BOJ एक बार फिर ब्याज दरें बढ़ा सकता है, संभवतः 1.25% तक। कुछ विश्लेषक यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि केंद्रीय बैंक हाल के समय की तुलना में ब्याज दरें और तेज़ी से बढ़ा सकता है।
बाज़ार की प्रतिक्रिया और आर्थिक जोखिम
आर्थिक आंकड़ों के सामने आने के बाद 21 अगस्त, 2026 को जापानी शेयर बाज़ारों ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी। निक्केई 225 इंडेक्स 0.79% गिरकर 65,695 पर बंद हुआ। निवेशक ऊंची ब्याज दरों की संभावना और आर्थिक सुस्ती के जोखिम के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक बड़ा जोखिम मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति से जुड़ा है, जिस पर केंद्रीय बैंक का कोई नियंत्रण नहीं है। वहां लगातार अस्थिरता रहने से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों पर असर पड़ सकता है, जिससे जापान के लिए लागत और बढ़ सकती है, क्योंकि यह देश ऊर्जा आयात पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।
निवेशकों के लिए सबसे अहम बात सितंबर में बैंक ऑफ जापान का फैसला होगा। केंद्रीय बैंक को महंगाई पर काबू पाने की ज़रूरत और ज़्यादा आक्रामक तरीके से उधार लेने की लागत बढ़ाकर आर्थिक विकास को धीमा करने के खतरे के बीच संतुलन साधना होगा।
