जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने संकट में घिरी 6,682 MSMEs को संजीवनी देने के लिए 'MSME Health Clinic' प्रोग्राम शुरू किया है। स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स के सामने लॉजिस्टिक्स की भारी लागत और टैक्स बदलाव बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने राज्य के छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों (MSMEs) को मंदी से बाहर निकालने के लिए एक औपचारिक कदम उठाया है। 'MSME Health Clinic' पहल के जरिए उन इकाइयों की पहचान की जा रही है जो फिलहाल भारी वित्तीय संकट (Financial Distress) से जूझ रही हैं। इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स डिपार्टमेंट के हालिया डेटा के अनुसार, कुल 294,014 इकाइयों में से 6,682 को तत्काल सरकारी मदद की जरूरत है। इनमें से 106 इकाइयां पुरानी समस्याओं से घिरी हैं, जबकि 34 महत्वपूर्ण इकाइयों को 'डिस्ट्रिक्ट-लेवल अपेक्स कमिटी' (District-Level Apex Committee) से राहत के लिए मंजूरी मिल चुकी है।
बाजार में टिकने की चुनौती
सरकार जहां डायग्नोस्टिक प्रोफाइलिंग (Diagnostic Profiling) पर जोर दे रही है, वहीं उद्योग जगत का मानना है कि असली दिक्कतें भौगोलिक और संरचनात्मक हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण रॉ मैटेरियल लाना और तैयार माल बाहर भेजना मैन्युफैक्चरर्स के लिए महंगा साबित हो रहा है। लखनपुर टोल टैक्स (Lakhanpur Toll Tax) हटने के बाद, स्थानीय उत्पादों को मिलने वाला सुरक्षा घेरा खत्म हो गया है, जिससे बाहर के सस्ते माल से मुकाबला करना मुश्किल हो गया है।
टैक्स और नीतिगत बदलावों का असर
GST लागू होने और 18% के स्लैब ने छोटे व्यवसायों की कमर तोड़ दी है। फेडरेशन चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज कश्मीर (Federation Chamber of Industries Kashmir) के अनुसार, कैश फ्लो की कमी से जूझ रहे छोटे उद्योगों के लिए नई टैक्स व्यवस्था में ढलना चुनौतीपूर्ण रहा है। अब ये इकाइयां सरकार से एक ऐसी इंडस्ट्रियल पॉलिसी की मांग कर रही हैं, जो स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग को सुरक्षा दे सके।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार सिर्फ डायग्नोस्टिक प्रोफाइलिंग तक सीमित रहेगी या फिर लॉजिस्टिक्स की लागत कम करने के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव जैसे ठोस कदम उठाएगी।
