Jammu & Kashmir में **971** इंडस्ट्रियल यूनिट्स के जरिए **₹14,294 करोड़** के निवेश का प्रस्ताव है, जिससे **52,000** नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य है। लेकिन हकीकत यह है कि अभी केवल **401** यूनिट्स ही काम कर रही हैं।
निवेश बनाम हकीकत का अंतर
Jammu & Kashmir में इंडस्ट्रियल बेस को मजबूत करने की कोशिशें अब एक बड़े इम्तिहान से गुजर रही हैं। 'New Central Sector Scheme' के तहत निवेश की खबरें तो खूब आईं, लेकिन उन प्रस्तावों को जमीनी हकीकत और नौकरियों में बदलने की रफ्तार अभी सुस्त है। सितंबर 2026 तक, सरकार ने 971 इंडस्ट्रियल यूनिट्स को रजिस्टर किया है, जिनका कुल इन्वेस्टमेंट प्रपोजल ₹14,294 करोड़ है। इस निवेश से 52,000 नौकरियां पैदा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, केवल 401 यूनिट्स ही कमर्शियल प्रोडक्शन (उत्पादन) के चरण तक पहुंच पाई हैं।
क्यों धीमी है रफ्तार?
प्रस्तावित प्रोजेक्ट्स और चालू फैक्ट्रियों के बीच का यह फासला अब चिंता का विषय बनता जा रहा है। ऐतिहासिक रूप से, प्रशासनिक रुकावटें और बुनियादी ढांचे (infrastructure) की दिक्कतों ने कई प्रोजेक्ट्स को सिर्फ कागजों तक सीमित रखा है।
राज्य का 'सेकेंडरी सेक्टर'—जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन और यूटिलिटीज शामिल हैं—उसकी ग्रोथ रेट घटकर 7.08% रह गई है, जो दो साल पहले 8.57% हुआ करती थी। चूंकि यह सेक्टर राज्य के कुल इकोनॉमिक आउटपुट का करीब एक-पांचवां हिस्सा है, इसलिए नई यूनिट्स के देरी से शुरू होने का सीधा असर राज्य की इकोनॉमिक स्टेबिलिटी पर पड़ रहा है।
क्या है भविष्य की योजना?
इस स्थिति को सुधारने के लिए मुख्यमंत्री Omar Abdullah की सरकार अब 'Industrial Policy 2026–35' तैयार कर रही है। नई पॉलिसी का मकसद सिर्फ साइन किए गए एग्रीमेंट्स की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि मौजूदा फर्मों की 'ऑपरेशनल वायबिलिटी' को सुधारना है। सरकार का फोकस अब ब्यूरोक्रेटिक बाधाओं को खत्म करने पर है।
इसके अलावा, Apex Committee ने पुरानी सेंट्रल स्कीम से बचे हुए लगभग ₹5,630 करोड़ के फंड को नई यूनिट्स को मंजूरी देने के लिए इस्तेमाल करने का फैसला किया है। अब निवेशकों और स्थानीय लोगों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह नई नीति प्रोजेक्ट अप्रूवल और कमर्शियल प्रोडक्शन के बीच के समय को कम कर पाएगी या नहीं।
