भारतीय परिवारों पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है, जिससे उनका मंथली बजट सिमट गया है। अब कमाई का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है, जिसका सीधा असर ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसी डिमांड पर पड़ सकता है। अब सबकी निगाहें **5-7 अक्टूबर 2026** को होने वाली RBI की मौद्रिक नीति बैठक पर टिकी हैं।
भारतीय उपभोक्ताओं के लिए अपने मासिक बजट को मैनेज करना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। कर्ज के ब्याज का बोझ साल 2021 के 1.5% से बढ़कर अब डिस्पोजेबल इनकम का 2.5% तक पहुंच गया है। यह ट्रेंड लोगों की खर्च करने की क्षमता पर सीधा असर डाल रहा है और गैर-जरूरी खर्चों में भारी कटौती देखने को मिल रही है।
कर्ज का बढ़ता जाल
इस आर्थिक दबाव की मुख्य वजह कर्ज के पैटर्न में आया बदलाव है। कुल घरेलू कर्ज का 58.4% हिस्सा अब नॉन-हाउसिंग रिटेल लोन (जैसे पर्सनल लोन और कंज्यूमर क्रेडिट) का है। इन अनसिक्योर्ड लोन पर ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं, जिसके कारण मंथली रीपेमेंट का हिस्सा बढ़ रहा है और ट्रैवल, एंटरटेनमेंट व लाइफस्टाइल जैसे क्षेत्रों में खर्च के लिए जेब ढीली नहीं हो पा रही है।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा असर?
इस वित्तीय दबाव को बाजार के उन सेक्टरों पर बारीकी से देखा जा रहा है जो कंज्यूमर स्पेंडिंग पर निर्भर हैं। रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा रिस्क में हैं। जब कर्ज चुकाने की लागत बढ़ जाती है, तो लोग महंगे सामानों की खरीदारी के लिए नया लोन लेने से बचते हैं। कंपनियां इस बात पर नजर गड़ाए हुए हैं कि कहीं डिमांड में कमी से उनके वॉल्यूम ग्रोथ पर बुरा असर न पड़े।
RBI की पॉलिसी और महंगाई का डर
मैक्रोइकॉनॉमिक मोर्चे पर अनिश्चितता बनी हुई है। अगस्त 2026 में रिटेल महंगाई 4.8% दर्ज की गई थी, जिसके चलते रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) एक मुश्किल स्थिति में है। 5 अक्टूबर से 7 अक्टूबर 2026 के बीच होने वाली MPC मीटिंग में ब्याज दरों को लेकर अहम फैसला लिया जाएगा। यदि दरें और बढ़ती हैं, तो रिटेल ग्राहकों के लिए उधार लेना और महंगा हो जाएगा। बाजार के जानकार अब क्रेडिट ग्रोथ और पर्सनल लोन में बढ़ती डिफॉल्ट दर जैसे संकेतों पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि ऊंची ब्याज दरों के माहौल में कॉर्पोरेट्स के प्रॉफिट मार्जिन को बचाए रखना एक चुनौती बना रहेगा।
